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जानें हागिया सोफिया का इतिहास, जिसे लेकर हिंदुओं को धमका रहा है मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

आज 5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) अयोध्या (Ayodhya) में श्री राम जन्मभूमि पूजन करेंगे, जिसके बाद मंदिर निर्माण शुरू होगा. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विवादित ढांचे और श्री राम मंदिर का फैसला हो पाया है. लेकिन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया है और हागिया सोफिया मस्जिद का उदाहरण देते हुए कहा बाबरी मस्जिद थी हमेशा रहेगी.


ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के जनरल सेक्रेटरी मौलाना वली रहमानी (Maulana Wali Rehmani) ने बयान जारी कर कहा कि बाबरी मस्जिद कल भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी. हागिया सोफिया (Hagia Sophia) इसका एक बड़ा उदाहरण. मस्जिद में मूर्तियां रख देने से या फिर पूजा-पाठ शुरू कर देने या एक लंबे अर्से तक नमाज पर प्रतिबंध लगा देने से मस्जिद की हैसियत खत्म नहीं हो जाती. उन्होंने कहा कि हमारा हमेशा यह मानना रहा है कि बाबरी मस्जिद किसी भी मंदिर या किसी हिंदू इबादतगाह को तोड़कर नहीं बनाई गई, हालात चाहे जितने खराब हों हमें हौसला नहीं हारना चाहिए. खालिफ हालात में जीने का मिजाज बनाना चाहिए.


जानें हागिया सोफिया का इतिहास

हाल ही में तुर्की में छठी सदी की ऐतिहासिक इमारत हागिया सोफिया को अदालत ने फिर से मस्जिद बनाने का फैसला दिया है. राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगन ने हागिया सोफिया को मस्जिद के रूप में खोलने की घोषणा भी कर दी. वह अंतरराष्ट्रीय चेतावनी दरकिनार कर दी गई, जिसमें कहा गया था कि 1500 वर्ष पुराने भवन की पहचान में कोई बदलाव न किया जाए. हागिया सोफिया 900 साल तक चर्च के रूप में पहचानी गई. इसके बाद 500 वर्षों तक मस्जिद के रूप में और फिर संग्रहालय के रूप में इसे जाना गया. विवाद अदालत की चौखट तक पहुंचा, तो इमारत को अमेरिका और ईसाइयों के विरोध के बावजूद मस्जिद करार दे दिया गया. अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा, आधुनिक तुर्की ने इमारत को संग्रहालय के रूप में गैरकानूनी ढंग से तब्दील किया था.


यूनेस्को की विश्व विरासत में शामिल इस धरोहर को सबसे अधिक लोग देखने आते हैं. ग्रीस ने अदालत के फैसले को सभ्य दुनिया को उकसाने वाला फैसला करार दिया है. वहीं, रूस के पारंपरिक चर्च ने कहा है कि अदालत ने उनका कोई भी पक्ष नहीं सुना. इस फैसले से  पूरब से लेकर पश्चिम तक उथल-पुथल मच गई. तुर्की की शीर्ष अदालत द काउंसिल ऑफ स्टेट ने कहा, जो समझौता हुआ है, उसमें ये मस्जिद है. इस आधार पर इसका किसी दूसरे तरह से इस्तेमाल किसी भी स्तर पर कानूनी नहीं है. दरअसल राष्ट्रपति एर्दोगन तुर्की की राजनीति में इस्लाम को सक्रिय रूप से मुख्यधारा में लाना चाहते थे, जिसके लिए वो 17 साल से लगे थे. वे काफी लंबे समय से छठी सदी के पुराने भवन को मस्जिद का दर्जा वापस दिलाने में लगे थे, जिसे आधुनिक धर्मनिरपेक्ष तुर्की के शुरुआती दिनों के शासक मुस्तफा कमाल अतातुर्क ने 1934 में संग्रहालय में बदला था.


Also Read: भूमि पूजन से पहले मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की धमकी, बाबरी मस्जिद थी और हमेशा रहेगी


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