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‘वंदे मातरम’ को मिले राष्ट्रगान का दर्जा: 26 जुलाई तक टली मामले की सुनवाई, बीजेपी नेता ने दिल्ली HC में दायर की है याचिका

वंदे मातरम (Vande Mataram) को राष्ट्रगान का दर्जा देने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई टाल दी गयी है. अब इस मामले पर अगली सुनवाई 26 जुलाई को होगी. यह याचिका बीजेपी प्रवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने दायर की है. याचिका में कहा गया है कि वंदे मातरम को आजतक जन-गण-मन के समान दर्जा नहीं दिया गया, ऐसे में कोर्ट को इस मामले दखल देना चाहिए.


याचिका में उपाध्याय ने मांग की है कि सभी स्कूलों में वंद मातरम को राष्ट्रगान के तौर पर बजाया जाना चाहिए. साथ ही इसको लेकर नेशनल पॉलिसी बनाने की मांग की गई है. याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में शुक्रवार को सुनवाई हो सकती है.


गौरतलब है कि वंदेमातरम की अनिवार्यता को लेकर कुछ मजहबी संगठन विरोध कर चुके हैं. उनका कहना है कि वंदे मातरम में देश को माता मानकर उनकी स्तुति की गई है, जिसका उनके मजहब में इजाजत नहीं है. इसलिए इसे किसी फरमान की तरह नहीं थोपा जा सकता.


इससे पहले 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान के अनुच्छेद 51अ यानी मौलिक कर्तव्य के तहत सिर्फ जन-गण-मन और राष्ट्रीय ध्वज का उल्लेख है, इसलिए वंदे मातरम् को अनिवार्य नहीं किया जा सकता है. कोर्ट ने यह टिप्पणी अश्विनी उपाध्याय की ही याचिका पर सुनवाई के दौरान की थी. इसके साथ ही उनकी इस याचिका को सिनेमाघरों में राष्ट्रगान अनिवार्य करने की मांग वाली याचिका के साथ जोड़ दिया था. याचिका में उपाध्याय ने मांग की थी कि सभी स्कूलों में वंदे मातरम बजाया जाना चाहिए. उसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रगान, राष्ट्र ध्वज और वंदे मातरम को प्रमोट करने के लिए नेशनल पॉलिसी बनाने की मांग की थी.


सरकारी दफ्तरों, कोर्ट, विधान परिषद और संसद में राष्ट्रगान अनिवार्य होना चाहिए. इस मांग पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई नहीं किया था. कोर्ट ने कहा था कि जहां तक राष्ट्रगान से संबंद्ध है, हम इस बहस में नहीं पडना चाहते. हालांकि कोर्ट ने स्कूलों में राष्ट्रगान को अनिवार्य करने संबंधी मांग पर सुनवाई करने के लिए तैयार होने की बात कही थी.


सुप्रीम कोर्ट ने जन-गण-मन और ‘वंदे मातरम’ को स्कूल सिलेबस का हिस्सा बनाने पर केंद्र सरकार की राय भी मांगी थी. उस वक्त अश्विनी उपाध्याय ने याचिका में कहा था कि भारत राज्यों का संघ है, राज्यों का संगठन नहीं है. यहां एक राष्ट्रीयता, एक राष्ट्रगान, एक राष्ट्रगीत और एक राष्ट्रीय झंडा है. इन सभी का सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य है.


वंदे मातरम को सबसे पहले आजादी के आंदोलन के दौरान बंगाल में गाया जाता था. धीरे-धीरे ये पूरे देश में लोकप्रिय हो गया. इसे कांग्रेस के अधिवेशनों में भी गाया जाता था लेकिन बाद में इसे लेकर मुस्लिमों को आपत्ति होने लगी. कुछ मुसलमानों को वंदे मातरम गाने पर इसलिए आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है.


मुसलमानों का मानना था कि ये गीत जिस आनंद मठ उपन्यास से लिया गया है, वह मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है. इन आपत्तियों के मद्देनजर सन् 1937 में कांग्रेस ने इस विवाद पर गहरा चिंतन किया और जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे. समिति ने पाया कि इस गीत के शुरुआती दो पद तो मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गए हैं, लेकिन बाद के पदों में हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र होने लगता है, लिहाजा फैसला लिया गया कि इस गीत के शुरुआती दो पदों को ही राष्ट्रगान के रूप में प्रयुक्त किया जाए. गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर के ‘जन-गण-मन अधिनायक जय हे’ को यथावत राष्ट्रगान रहने दिया गया. मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने ‘सारे जहां से अच्छा’ के साथ बंकिमचन्द्र चटर्जी द्वारा रचित शुरुआती दो पदों का गीत ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत के तौर पर स्वीकार किया गया.


सन 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया. पांच साल बाद यानी सन 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में चरणदास ने इसे फिर गाया. 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया. बाद में कांग्रेस के कई अधिवेशनों की शुरुआत इससे हुई. आजादी के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 में ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया. हालंकि संविधान के अनुच्छेद 51अ यानी मौलिक कर्तव्य के तहत जन-गण-मन और राष्ट्रीय ध्वज का उल्लेख है, वंदे मातरम कोई जिक्र नहीं है.


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