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विदेशी मजहब मानने वालों से छीना जाए अल्पसंख्यक का दर्जा, भाजपा नेता की प्रधानमंत्री से अपील

भारतीय जनता पार्टी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा (Minority Defination) तय करने करने के लिए प्रधानमंत्री से मांग की है. उपाध्याय का कहना है माइनॉरिटी को तत्काल डिफाइन करने की जरूरत है, औऱ माइनॉरिटी का दर्जा उन्हीं धर्मों को मिलना चाहिए जो भारत में शुरू हुए और जो भाषाएं भारत में बोली जाती हैं. बता दें कि अश्विनी उपाध्याय ने अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट मं याचिका दायर की है जिसपर 28 फरवरी 2020 को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने गृहमंत्रालय, कानून मंत्रायलय और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय से जवाब मांगा है.


अश्विनी उपाध्याय ने ट्विटर पर वीडियो शेयर करके कहा कि भारत का संविधान भारतीयों के लिए बना है जो लोग यहां की जमीन पर पैदा हुए, यहां रहते हैं यह उन्हीं के लिए है, विदेशियों के लिए नहीं. जब संविधान का आर्टिकल 30 कहता है कि धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक लोगों को अपना स्कूल खोलने का अधिकार है जो यह दुनिया के सभी धर्मों के लिए नहीं कहता है, यह केवल उन धर्मों के लिए कहा गया है जिनकी उत्पत्ति भारत में हुई है. हमें इन्हीं धर्मों में छांटने की जरूरत होगी कि कौन अल्पसंख्यक होगा और कौन बहुसंख्यक.



उपाध्याय ने कहा कि ऐसे दुनिया में तो 300 से अधिक धर्म हैं आप सभी धर्मों को भारत में मायनॉरिटी का दर्जा नहीं दे सकते. ऐसे ही आर्टिकल 30 कहता है कि जो लोग भाषा के आधार अल्पसंख्यक उन्हें अपना स्कूल खोलने का अधिकार है. ऐसे दुनिया में 6000 से अधिक भाषाएं बोली जाती हैं आप सबको भारत में अल्पसंख्यक का दर्जा नहीं दे सकते, अल्पसंख्यक उन्हें ही बनाया जा सकता जिन्हें भारत में बोलना शुरू किया गया, इसके लिए राज्यों में देख सकते हैं कौन कहां अल्पसंख्यक कौन बहुसंख्यक है.


बीजेपी नेता ने कहा कि भाषायी अल्पसंख्यक हो या धार्मिक अल्पसंख्यक हो जो भाषा भारत में शुरू हुई उन्हीं में भाषाई अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक देखना चाहिए या जो धर्म भारत में शुरू हुए उन्हें ही माइनॉरिटी- मेजोरिटी का दर्जा दिया जा सकता है. विदेशी धरती पर जो धर्म हुए चाहे वह ईसाई हो, इस्लाम हो, यहूदी हो, पारसी हो इन्हें आप माइनॉरिटी का दर्जा नहीं दे सकते. भारत का संविधान केवल भारत और भारत में बोली जाने वाली भाषाओं और यहां शुरू होने वाले धर्मों के लिए है. इसीलिए अब माइनॉरिटी को तत्काल डिफाइन करने की जरूरत है, औऱ माइनॉरिटी का दर्जा उन्हीं धर्मों को मिलना चाहिए जो भारत में शुरू हुए और जो भाषाएं भारत में बोली जाती हैं.


माइनॉरिटी को परिभाषित करने के लिए HC में दायर कर चुके हैं याचिका

अश्विनी उपाध्याय ने देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है. उपाध्याय ने इस याचिका में केंद्र के 26 वर्षीय अधिसूचना की वैधता को चुनौती दी गई है, जिसमें पांच समुदायों- मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है. इसने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) अधिनियम 1992 की धारा 2 (c) को अघोषित करने की मांग की गई है. जिसके तहत 23 अक्टूबर, 1993 को अधिसूचना जारी की गई थी.


उपाध्याय ने राष्ट्रीय औसत के बजाय किसी समुदाय की राज्य-वार (state wise) जनसंख्या के आधार पर ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को परिभाषित करने के लिए दिशानिर्देश देने की मांग की है. उन्होंने याचिका में कहा है कि यह अधिसूचना स्वास्थ्य, शिक्षा, आश्रय और आजीविका के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है.


बता दें कि अश्विनी उपाध्याय ने अल्पसंख्यक आयोग को 17 नवंबर 2017 को ज्ञापन दिया था और मांग की थी कि पांच समुदायों को अल्पसंख्यक घोषित करने की 1993 की अधिसूचना रद्द की जाए. सुप्रीम कोर्ट ने आयोग को 3 महीने के भीतर उस ज्ञापन पर फैसला लेने को कहा था. उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कोर्ट से अल्पसंख्यक की परिभाषा और पहचान तय करने की मांग की थी. भारत के संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उन लोगों के लिए कुछ अलग से प्रावधान किया गया है जो भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं.


2011 के जनसंख्या आकड़ों के मुताबिक देश के आठ राज्यों लक्ष्यद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिन्दू अल्संख्यक हैं लेकिन उनके अल्पसंख्यक के अधिकार बहुसंख्यकों को मिल रहे हैं. इसी तरह लक्ष्यद्वीप, जम्मू कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं जबकि असम, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में में भी उनकी ठीक संख्या है लेकिन वे वहां अल्पसंख्यक दर्जे का लाभ ले रहे हैं.


मिजोरम, मेघालय, नगालैंड में ईसाई बहुसंख्यक हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश, गोवा, केरल, मणिपुर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल मे भी ईसाइयों की संख्या अच्छी है इसके बावजूद वे अल्पसंख्यक माने जाते हैं. पंजाब मे सिख बहुसंख्यक हैं और दिल्ली, चंडीगढ़ और हरियाणा में भी सिखों की अच्छी संख्या है लेकिन वे अल्पसंख्यक माने जाते हैं.


पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2006 में राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में कहा था, ‘‘यह सुनिश्चित करने के लिए कि अल्पसंख्यक, खासकर मुसलमान विकास में बराबरी से फायदा ले सकें, हमें मौलिक योजना बनानी पड़ेगी. संसाधनों पर उनका पहला हक होना चाहिए.’’ मनमोहन सिंह के उस बयान को भारतीय जनता पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण से जोड़कर देखती है और कांग्रेस को ‘मुस्लिम पार्टी’ ठहराने को कोशिश करती रही है. मनमोहन सिंह ने तो ‘अल्पसंख्यक’ माने मुसलमान मान लिया था लेकिन आजादी के सात दशक बाद भी देश में असली अल्पसंख्यक कौन है यह तय नहीं हो पाया है. अब  अल्पसंख्यक की परिभाषा तय होने वाली है. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग से कहा था कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा और पहचान तय करने की मांग वाले ज्ञापन पर शीघ्र फैसला ले. बीजेपी के नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कोर्ट से अल्पसंख्यक की परिभाषा और पहचान तय करने की मांग की थी.


भारत के संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उन लोगों के लिए कुछ अलग से प्रावधान किया गया है जो भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं. लेकिन ‘अल्पसंख्यक’ की सटीक व्याख्या और परिभाषा नहीं होने की वजह से इसका बड़े स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है. मिसाल के तौर पर 2011 की जनगणना के आंकड़ों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में 68 फीसदी जनसंख्या मुसलमानों की है. अत: जनसंख्या के आधार पर इस राज्य में मुसलमान किसी भी दृष्टिकोण से अल्पसंख्यक नहीं कहे जा सकते हैं. लेकिन वहां, अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सारी सहूलियतें इन्हें मिलती हैं. जबकि वहां हिन्दू समुदाय जो वास्तविक रूप से अल्पसंख्यक है, वह उन सुविधाओं से महरूम हैं. हालांकि ऐसा नहीं है कि यह मामला केवल जम्मू-कश्मीर तक ही सीमित है. अगर ध्यान से देखें तो भारत के तमाम हिस्सों में अल्पसंख्यक शब्द को परिभाषित नहीं किए जाने की वजह से किसी न किसी समुदाय के साथ अन्याय हो रहा है. 2011 के जनसंख्या आकड़ों के मुताबिक देश के आठ राज्यों लक्ष्यद्वीप, मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, जम्मू कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब में हिन्दू अल्संख्यक हैं लेकिन उनके अल्पसंख्यक के अधिकार बहुसंख्यकों को मिल रहे हैं. इसी तरह लक्ष्यद्वीप, जम्मू कश्मीर में मुसलमान बहुसंख्यक हैं जबकि असम, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश तथा बिहार में में भी उनकी ठीक संख्या है लेकिन वे वहां अल्पसंख्यक दर्जे का लाभ ले रहे हैं. मिजोरम, मेघालय, नगालैंड में ईसाई बहुसंख्यक हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश, गोवा, केरल, मणिपुर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल मे भी ईसाइयों की संख्या अच्छी है इसके बावजूद वे अल्पसंख्यक माने जाते हैं. पंजाब मे सिख बहुसंख्यक हैं और दिल्ली, चंडीगढ़ और हरियाणा में भी सिखों की अच्छी संख्या है लेकिन वे अल्पसंख्यक माने जाते हैं.


● मुस्लिम बहुसंख्यक वाले राज्य -लक्ष्यद्वीप में (96.20 फीसद), जम्मू कश्मीर में (68.30 फीसद) असम में (34.20 फीसद),पश्चिम बंगाल में (27.5 फीसद), केरल में (26.60 फीसद), उत्तर प्रदेश में (19.30 फीसद) तथाबिहार में (18 फीसद) हैं लेकिन इन राज्यों में मुसलमालों को अल्पसंख्यक का दर्जा मिला है और अल्पसंख्यकों को मिलने वाली तमाम रियायतें मिलती हैं.


● ईसाई बहुसंख्यक वाले राज्य -मिजोरम (87%) मेघालय (74.59%) , नागालैंड ( 81.10%) में बहुसंख्यक हैं जबकि अरुणाचल प्रदेश, गोवा, केरल, मणिपुर, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल मे भी इनकी संख्या अच्छी है इसके बावजूद ये अल्पसंख्यक माने जाते हैं.


● सिख बहुसंख्यक वाले राज्य- पंजाब (57.69%) में सिख बहुसंख्यक हैं जबकि चंडीगढ़ (13.11%), हरियाणा (4.91%), दिल्ली (5.4%)में भी अच्छी संख्या मे है लेकिन वे अल्पसंख्यक माने जाते हैं.


अल्‍पसख्‍ंयकों को लेकर ऐतिहासिक तथ्‍य

भारत में अल्पसंख्यक शब्द की अवधारणा ब्रिटिशकालीन है. सन 1899 में तत्कालीन ब्रिटिश जनगणना आयुक्त द्वारा कहा गया था भारत में सिख, जैन, बौद्ध, मुस्लिम को छोड़कर हिन्दू बहुसंख्यक हैं. यहीं से अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद के विमर्श को बल मिलने लगा. संविधान निर्माण के लिए जब संविधान सभा बैठी तब ‘अल्पसंख्यक’ के मुद्दे पर जोरदार बहस हुई. 26 मई 1949 को संविधान सभा में अल्पसंख्यक आरक्षण पर बहस के दौरान अनुसूचित जातियों को आरक्षण देने के प्रश्न पर आम राय थी. लेकिन अल्पसंख्यक आरक्षण पर आम राय नहीं बन पा रही थी. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने साफ किया कि पंथ/ आस्था/ मजहब/धर्म आधारित आरक्षण गलत है. उस समय तक अल्पसंख्यक का मतलब मुसलमान हो चुका था. बिहार के वरिष्ठ नेता और संविधान सभा के सदस्य तजम्मुल हुसैन ने जोर देकर कहा था की ‘हम अल्पसंख्यक नहीं हैं. अल्पसंख्यक शब्द अंग्रेजों का निकाला हुआ है. अंग्रेज यहां से चले गए, अब इस शब्द को डिक्शनरी से हटा दीजिए. अब हिन्दुस्तान में कोई अल्पसंख्यक वर्ग नहीं रह गया है.’ तजम्मुल हुसैन के भाषण के इस अंश पर सभा में खूब वाहवाही हुई थी.


अल्पसंख्यक : संवैधानिक स्थिति

संविधान निर्माताओं ने संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उन लोगों के लिए कुछ अलग से प्रावधान किया जो भाषा और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक श्रेणी में आते हैं. अनुच्छेद 29 का शीषर्क है- अल्पसंख्यक वर्ग के हितों का संरक्षण. यहां कहा गया है कि भारत के किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग को, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, उसे बनाए रखने का अधिकार होगा. इस अनुच्छेद में ‘अल्पसंख्यक’ कौन है, इसकी परिभाषा नहीं निकलती. संविधान के अनुच्‍छेद 366 के 30 उपखण्डों में जहां हैं संविधान में प्रयोग किये गए अभिव्यक्तियों जैसे पेंशन, रेल, सर्वोच्च न्यायालय, अनुसूचित जाति, जनजाति जैसे शब्दों की परिभाषा को शामिल किया गया है वहां भी ‘अल्पसंख्यक’ को परिभाषित नहीं किया गया है. यहां पर एक तथ्‍य और गौर करने लायक है कि संविधान निर्माताओं को अल्पसंख्यक आयोग के गठन की जरूरत नहीं महसूस हुई थी. लेकिन राजनीति को इसकी जरूरत थी, सो सरकार ने 12 जनवरी 1978 को अल्‍पसंख्‍यक आयोग की स्‍थापना की. इस आयोग के गठन का आधार अल्‍पसंख्‍यकों से भेदभाव, उनकी सुरक्षा, देश की धर्मनिरपेक्ष परंपरा को बनाए रखने और राष्‍ट्रीय एकता को बढ़ावा देना था. अल्पसंख्यक आयोग को संसद द्वारा 1992 के ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम’ (नेशनल कमीशन फार माइनेरिटी एक्ट) के तहत ‘राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग’ बनाया गया. इस एक्ट में भी अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं तय की गई. यह आयोग सरकार द्वारा अल्‍पसंख्‍यकों के लिए लागू की जाने वाली योजनाओं और नीतियों को प्रभावी तरीके से लागू करने पर नजर रखता है. इसी अधिनियम की धारा 2(सी) के तहत केन्द्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का असीमित अधिकार है. यह भी जानना रोचक है कि किसी जाति समूह को अनुसूचित जाति या जनजाति घोषित करने की विधि बहुत जटिल है और यह काम केवल संसद ही कर सकती है ( अनुच्छेद 341-342).


लेकिन किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का काम सरकारी दफ्तर से ही हो सकता है. इसी अधिकार का इस्तेमाल करते हुए केन्द्र सरकार ने 23 अक्टूबर 1993 को एक अधिसूचना के जरिये पांच समुदायों मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया. 27 जनवरी 2014 को तत्कालीन यूपीए सरकार ने लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इसी कानून के तहत जैन समुदाय को भी अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के रूप में अधि‍सूचि‍त कर दि‍या.


अल्पसंख्यक होने के फायदे

अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद उसके सदस्यों को अल्पसंख्यकों के लिए कल्याण कार्यक्रमों और छात्रवृत्तियों में केंद्रीय मदद मिलती है. वे अपने शैक्षिक संस्थान भी चला सकते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक जम्मू कश्मीर में वर्ष 2016-17 में अल्पसंख्यकों के लिए निर्धारित प्री-मैट्रिक स्कॉलरशिप का फायदा जिन छात्रों को मिला है उनमें 1 लाख 5 हजार से अधिक छात्र मुसलमान समुदाय से आते हैं जबकि सिख, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म के 5 हजार छात्रों को इसका फायदा मिल सका है. इसमें भी हिन्दू समुदाय के किसी भी छात्र को इसका फायदा नहीं मिला है जबकि जनसंख्या के आधार पर जम्मू-कश्मीर में हिन्दू मुसलमानों से बहुत कम हैं. जम्मू कश्मीर में तकनीकी शिक्षा में 20,000 रुपये छात्रवृत्ति दी जाती है. राज्य में मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद सरकार ने वहां 753 में से 717 छात्रवृत्ति मुस्लिम छात्रों को आवंटित की हैं एक भी हिन्दू को छात्रवृत्ति नहीं दी गई है.


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