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कर्म ‘योगी’: जिनके लिए परंपरा से बड़ा है फर्ज, तोड़ी वर्षों पुरानी रिवाज

Yogi adityanath

कोरोना वायरस (Corona Virus) के चलते देश में 21 दिन का लॉकडाउन जारी है. कोविड-19 के संक्रमण से बचने के लिए लगातार सोशल डिस्टेंसिंग की अपील की जा रही है. इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) ने इस बार नवरात्रि (Navratri) के नवमी के अवसर पर कन्या पूजन नहीं किया. सामन्य तौर पर वे हर साल नवरात्रि के समापन के मौके पर कन्या पूजन करते हैं. बता दें कि सीएम योगी गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर भी हैं और वहां के लिए नवरात्रि बेहद खास होती है, वे हर साल पूरे व्रत रहकर कन्या पूजन करते हैं, इस बार भी योगी योगी व्रत तो पूरे रहे लेकिन कन्या पूजन नहीं किया.


गोरक्षपीठ के लिए साल के दोनों नवरात्र बेहद खास होते हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इस पीठ के पीठाधीश्वर भी हैं. लिहाजा उनके लिए भी ये खास है. पहले दिन कलश पूजन के साथ वहां अनुष्ठान शुरू हो जाता है. सारी व्यवस्था मठ के पहली मंजिल पर ही होती हैं. परंपरा है कि इस दौरान पीठाधीश्वर और उनके उत्तराधिकारी मठ से नीचे नहीं उतरते. शारदीय नवरात्र में तो यह अनिवार्य होता है, चैत्र की नवरात्र में भी ऐसी ही उम्मीद की जाती है. इस दौरान पूजा-पाठ के बाद रूटीन के काम और खास मुलाकातें ऊपर ही होती हैं. समापन नवमी के दिन कन्या पूजन से होता है. जिसे पीठ के उत्तराधिकरी या पीठाधीश्वर करते हैं.


वर्षों से योगी आदित्यनाथ इस परंपरा को निभाते रहे हैं. इस बार कोरोना के कारण लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के मानकों के अनुपालन में उन्होंने कन्या पूजन भी नहीं किया. हाल के वर्षों में यह पहली बार हुआ जब योगी जी ने कन्या पूजन नही किया. परंपरा पर फर्ज की ये जीत पहली बात नहीं हुई है, पहले भी हो चुकी है. इस बार के अभूतपूर्व संकट में तो वह गोरखनाथ मंदिर गये ही नहीं. जहां रहे वहीं परंपरा के अनुसार पूजा-पाठ किया.



इससे पहले भी टूटी है परंपरा

30 सितम्बर 2014 की बात है. गोरखपुर कैंट स्टेशन के पास नंदानगर रेलवे क्रासिंग पर लखनऊ-बरौनी और मडुआडीह-लखनऊ एक्सप्रेस. की टक्कर हुई थी. रात हो रही थी। गुलाबी ठंड भी पडऩे लगी थी. हादसे की जगह से रेलवे और बस स्टेशन की करीब 5-6 किमी की दूरी. हजारों यात्री. साधन उतने थे नहीं. मय सामान और परिवार के साथ स्टेशन तक पहुँचना मुश्किल था. खासकर उनको जिनके साथ छोटे बच्चे और महिलाएं थी. तब वे गोरखपुर के सांसद थे.


उस दौरान चर्चा होने लगी कि छोटे महाराज (उस समय लोग पूरे पूर्वांचल में प्यार से उनको यही कहते थे) आ जाते तो सब ठीक हो जाता. उनको सूचना थी ही, समस्या की गंभीरता से वाकिफ होते ही वर्षो की परंपरा तोडक़र वह मौके पर पहुंचे. साथ मे उनके खुद के संसाधन और समर्थक भी. प्रशासन भी सक्रिय हुआ. देर रात तक सब सुरक्षित स्टेशन पहुंच चुके थे. यकीनन इस बार भी उनकी मेहनत रंग लाएगी और प्रदेश कोरोना के इस संकट से पार पा लेगा.


Also Read: कोरोना आपदा में सीएम योगी प्रदेश के मुखिया का ही नहीं, बेटे का भी निभा रहे हैं फर्ज


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