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सुप्रीम कोर्ट का सभी राजनीतिक दलों को निर्देश- बताना होगा, क्यों दिया अपराधिक छवि के उम्मीदवार को टिकट?

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने राजनिति में अपराधिक छवि के लोगों की बढ़ रही संख्या पर गुरूवार को चिंता व्यक्त की है. शीर्ष अदालत ने सभी राजनीतिक दलों से कहा है कि अपनी वेबसाइट पर आपराधिक छवि वाले उम्मीदवारों के चयन की वजह बताएं. साथ ही दागी उम्मीदवारों के आपराधिक आंकड़ों की जानकारी चुनाव आयोग को दी जाए. राजनीति में आपराधिक प्रवत्ति के लोगों पर रोक लगाने के लिए बीजेपी नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राजनीतिक पार्टियों को ये दिशानिर्देश दिए हैं.


गुरुवार को अश्विनी उपाध्या की याचिक पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये आदेश दिया है. अदालत के फैसले के अनुसार, सभी राजनीतिक दलों को उम्मीदवार घोषित करने के 72 घंटे के भीतर चुनाव आयोग को भी इसकी जानकारी देनी होगी. साथ ही घोषित किए गए उम्मीदवार की जानकारी को स्थानीय अखबारों में भी छपवानी होगी.


अश्विनी उपाध्याय ने फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि अगर कोई भी उम्मीदवार या राजनीतिक दल इन निर्देशों का पालन नहीं करेगा, तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा. यानी सभी उम्मीदवारों को अखबार में अपनी जानकारी देनी होगी. उपाध्याय ने बताया कि अगर किसी नेता या उम्मीदवार के खिलाफ कोई केस नहीं है और कोई भी FIR दर्ज नहीं है तो उसे भी इसकी जानकारी देनी होगी. अगर कोई भी नेता सोशल मीडिया, अखबार या वेबसाइट पर ये सभी जानकारियां नहीं देता है तो चुनाव आयोग उसके खिलाफ एक्शन ले सकता है और सुप्रीम कोर्ट को भी जानकारी दे सकता है.


क्या था याचिका में ?

उपाध्याय ने याचिका में कहा था कि एडीआर की ओर से प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार भारत में राजनीति के अपराधीकरण में बढ़ोतरी हुई है और 24% सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं. 2009 के लोकसभा चुनाव में 7,810 प्रत्याशियों का विश्लेषण करने पर पता चला कि इनमें से 1,158 या 15% ने आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी. इन प्रत्याशियों में से 610 या 8% के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले दर्ज थे. इसी तरह, 2014 में 8,163 प्रत्याशियों में से 1398 ने आपराधिक मामलों की जानकारी दी थी और इसमें से 889 के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले लंबित थे.


क्या हैं अपराधीकरण पर जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम कानून के नियम


जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा आठ दोषी राजनेताओं को चुनाव लड़ने से रोकती है. लेकिन ऐसे नेता जिन पर केवल मुकदमा चल रहा है, वे चुनाव लड़ने के लिये स्वतंत्र हैं. भले ही उनके ऊपर लगा आरोप कितना भी गंभीर है. जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा आठ(1) और (2) के अंतर्गत प्रावधान है कि यदि कोई विधायिका सदस्य (सांसद अथवा विधायक) हत्या, दुष्कर्म, अस्पृश्यता, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम के उल्लंघन, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर शत्रुता पैदा करना, भारतीय संविधान का अपमान करना, प्रतिबंधित वस्तुओं का आयात या निर्यात करना, आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होना जैसे अपराधों में लिप्त होता है, तो उसे इस धारा के अंतर्गत अयोग्य माना जाएगा और छह वर्ष की अवधि के लिये अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा.



जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा आठ(3) में प्रावधान है कि उपर्युक्त अपराधों के अलावा किसी भी अन्य अपराध के लिये दोषी ठहराए जाने वाले किसी भी विधायिका सदस्य को यदि दो वर्ष से अधिक के कारावास की सजा सुनाई जाती है तो उसे दोषी ठहराए जाने की तिथि से अयोग्य माना जाएगा. ऐसे व्यक्ति सजा पूरी किये जाने की तारीख से छह वर्ष तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे. जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा आठ(4) के अनुसार यदि दोषी सदस्य निचली अदालत के इस आदेश के खिलाफ तीन महीने के भीतर हाईकोर्ट में अपील दायर कर देता है तो वह अपनी सीट पर बना रह सकता है. हालांकि इस धारा को 2013 में ‘लिली थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक बताकर निरस्त कर दिया था.


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