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UP: आजम खान के सपरिवार जेल जाने से खुश हैं ये अधिकारी, कहा- मुझे जबरन भेजा था जेल, CM वैसा ही सलूक करें…जैसा मेरे साथ हुआ

Azam Khan

रामपुर से समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान (Azam Khan), उनकी पत्नी और बेटे अब्दुल्ला आजम खान को जेल होने पर उत्तर प्रदेश सचिवालय संघ के एक अधिकारी ने खुशी जाहिर की है। अधिकारी ने फेसबुक पर पोस्ट शेयर कर आजम खान के जुल्मों को बयान किया है। यही नहीं, अफसर ने आजम खान द्वारा स्वयं पर रामपुर जेल में कराए गए उत्पीड़न की दास्तां शेयर करते हुए सीएम योगी से आजम के साथ भी उसी तरह का सलूक किए जाने की मांग की है।


उत्तर प्रदेश सचिवालय संघ के अध्यक्ष यादवेंद्र मिश्र ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा कि जो जस करई, सो तस फल पावा। अगली लाइन में उन्होंने लिखा कि दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय। मरे खाल की साँस सो, सार भसम होई जाय। वो आगे लिखते हैं कि जानकारी में आया है कि Badtamize आज़म + 2 को रामपुर जेल से 240 किलोमीटर दूर सीतापुर जेल में सुबह 4 बजे ट्रांसफर किया गया।


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14 दिसंबर 1994 को मुझे गिरफ्तार कर ठण्ड की कड़कड़ाती रात में पुलिस की खुली वैन में लखनऊ से 320 किलोमीटर दूर रामपुर जेल ले जाया गया। इनके कहने पर मुझे 3 बजे रामपुर जेल में बंद किया गया। इनका जुल्म यहीं नहीं थमा। मुझे तन्हाई (4’×7′) वाली कोठरी में बंद रखा गया। जेल में खाने के लिए अधपकी जली रोटियाँ, पानी जैसी दाल, जानवरों के चारे वाली बरसीम का झलरा दिया जाता था।


धान के पैरा पर लेटने और खटमल वाले कंबल से रात गुजारने पर मजबूर किया गया। पारिवारिक सदस्यों से मिलने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। हर 15 दिन में रामपुर से लखनऊ कोर्ट में पेशी के लिए पुलिस वाले रात में ही जेल से बाहर निकालते थे। रामपुर पुलिस एक आतंकी की तरह जेल से हांथो में हथकड़ी डाल कर मुझे लखनऊ कोर्ट में पेशी पर लाती थी। कमोबेश हर बार ऐसा ही होता था। इनके जुल्मों की क्या क्या कहानी लिखें।


रामपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी, तत्कालीन जेल सुपरिटेंडेंट, तत्कालीन प्रमुख सचिव, गृह तक इनके इशारों पर प्रताड़ना की कोई कसर नहीं छोड़ते थे। रामपुर जेल में इनके स्थानीय करिंदे जेल सुपरिटेंडेंट को निर्देश देते थे कि हमारे साथ किस तरह का सुलूक किया जाए। 26 साल के बाद, समय ने एक बार फिर करवट बदली। वही पुलिस वाले, वही पुलिस की गाड़ी, कुछ वैसी ही रात। 240 किलोमीटर की यात्रा में वही दिमागी तनाव। सब कुछ एक जैसा ही।


फर्क बस इतना कि हम अपनों के लिए शान से सिर उठाकर जेल गए और एक यह हैं कि सर झुकाते हुए दागदार होकर अपने कुनबे के साथ जेल भेजे गए। बदले परिवेश और 1994 की प्रदेश ब्यापी हड़ताल में पीडा के शिकार कर्मचारियों/कर्मचारी नेताओं का मुख्यमंत्री जी से अनुरोध है कि इनके साथ भी वही सब किया जाए जो इन्होंने दूसरों को दुःख पहुंचाने के लिए किया है। इससे जहां सचिवालय सहित राज्य कर्मचारियों के दिलों को सुकून मिलेगा वहीँ कर्मचारी जगत से बड़ी दुआएं भी मिलेंगी।


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