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‘वनवास’ भोग रहे मोदी से पहली बार बढ़ीं थी जेटली की नजदीकियां, मुख्यमंत्री बनवाने में भी निभाया था अहम रोल

आज पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता रह चुके अरुण जेटली (Arun Jaitley) की पहली पुण्यतिथि है. आज ही के दिन पिछले साल उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा था. अरुण जेटली की पहली पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) ने उन्हें श्रद्धांजलि दी है. पीएम मोदी के अलावा, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और अन्य कई दिग्गज नेताओं ने उन्हें आज याद किया है. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बाद सरकार में तीसरे सबसे ताकतवर मंत्री माने जाते थे.


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गुड्स एंड सर्विसेज टैक्‍स यानी जीएसटी को लागू कराने का श्रेय अरूण जेटली को जाता है. वे पेशे से वकील थे, लेकिन कानूनी के साथ-साथ वित्तीय मामलों पर पकड़ रखते थे. उनके पास कुछ महीने वित्त के साथ-साथ रक्षा जैसे दो अहम मंत्रालय का प्रभार था. चार साल बाद जब राफेल का मुद्दा गरमाया, तब वे सरकार के लिए ट्रबलशूटर बनकर उभरे और संसद में विपक्ष के आरोपों के खिलाफ मोर्चा संभाला. वे लंबे समय तक भाजपा के प्रवक्ता रहे. वाजपेयी सरकार और मोदी सरकार में उन्होंने सूचना और प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली.


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राजनीतिक जानकार मानते हैं कि 2014 में पहली बार सत्ता पर काबिज होने के बाद नरेंद्र मोदी को दिल्ली की लुटियंस राजनीति से परिचित कराने वाले जेटली ही थे. उन्हें मोदी का ‘चाणक्य’ यूं नहीं कहा जाता. दोनों के रिश्तों ने एक लंबा सफर तय किया है. कहा जाता है कि गुजरात की राजनीति से ‘वनवास’ पर मोदी को दिल्ली भेजे जाने के बाद उनकी और जेटली की नजदीकियां बढ़ी थीं.


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दरअसल, उस वक्त गुजरात बीजेपी में उठापटक का दौर चल रहा था. 1995 से 2001 के बीच छह सालों के लिए मोदी सूबे की राजनीति से गायब हो गए. वहां उन्हें मुश्किलें खड़ी करने वाले प्रचारक के तौर पर देखा जाने लगा था. इस दौरान मोदी दिल्ली स्थित पार्टी मुख्यालय में रह रहे थे. यहीं पर वह जेटली के संपर्क में आए. कहा जाता है कि मोदी को सीएम के तौर पर गुजरात भेजने के फैसले के पीछे आडवाणी के साथ जेटली भी खड़े थे.


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मोदी को सीएम बनाकर भेजना एक बड़ा राजनीतिक निर्णय था. ऐसा इसलिए क्योंकि पहली बार किसी सक्रिय आरएसएस प्रचारक को सीधे राजनीति में उतारा जा रहा था. खबरों के मुताबिक, जब 90 के दशक में दिल्ली में मोदी को बीजेपी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया तो वह उस वक्त जेटली के 9 अशोका रोड स्थित बंगले के एक हिस्से में रह रहे थे. उस वक्त जेटली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री थे. कहा जाता है कि गुजरात में केशुभाई पटेल को हटाने और मोदी को लाने के फैसले के पीछे जेटली भी थे. बहुत सारे पत्रकारों को वो दौर याद है, जब मोदी अक्सर जेटली के दिल्ली स्थित आवास पर जाते थे. 1992 से लेकर 1997 तक जेटली के साथ दफ्तर शेयर कर चुके वकील दुष्यंत दवे ने भी एक इंटरव्यू में माना कि मोदी वहां भी आते थे.


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एक वरिष्ठ पत्रकार की मानें तो कि जेटली का दिल्ली में बेहद शानदार सर्किल था. उन्होंने मोदी का उसी तरह ख्याल रखा जैसा कि वह अपने बहुत सारे नजदीकियों का रखा करते थे. हालांकि, उस वक्त मोदी को उतनी अहमियत और किसी ने नहीं दी, जितनी जेटली ने दी. बाद के सालों में मोदी ने भी जेटली के इस एहसान को उतारा.


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इसके बाद से मोदी और जेटली ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. दोनों के व्यक्तित्व में बड़ा बदलाव आया. मोदी एक करिश्माई जन नेता के तौर पर उभरे, जिनके पास गजब की भाषण शैली है. वहीं, जेटली की पर्दे के पीछे ज्यादा सक्रिय भूमिका वाले नेता के तौर पर पहचान बनी.


Jaitley under fire, Modi the target - Rediff.com India News

कहा जाता है कि 2002 के दंगों की वजह से जब मोदी का पार्टी के अंदर भी विरोध हो रहा था, उस वक्त भी जेटली उनके साथ खड़े थे. जेटली राज्यसभा के लिए पहली बार गुजरात से निर्वाचित हुए थे. राजनीतिक खबरों की मानें तो 2004 में मध्य प्रदेश में उमा भारती की जगह शिवराज सिंह चौहान को लाने के फैसला में भी जेटली शामिल थे.


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1999 में मोदी और जेटली ने अपने रिश्तों पर राजीव शुक्ला के टीवी शो रूबरू पर खुलकर बात की थी. मोदी ने जेटली संग अपने अपने रिश्तों को जेपी आंदोलन के वक्त से बताया और उन्हें ‘राजनीति में दुर्लभ कॉम्बिनेशन’ करार दिया. वहीं, जब बाद में शुक्ला ने जेटली का इंटरव्यू लिया तो उन्होंने भी मोदी को एक अनुशासित और ‘क्रिएटिव’ राजनेता व ‘मुश्किल टास्कमास्टर’ करार दिया था.


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