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जब दीनदयाल ने कहा- मुझे बधाई न दें, यह मेरा नववर्ष नहीं, दलीलें सुन सोचने को मजबूर हो गए थे अध्यापक

आज यानि कि शुक्रवार को जनसंघ के संस्थापक और ‘एकात्म मानववाद’ का संदेश देने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय पंडित दीन दयाल उपाध्याय (Pandit Deen Dayal Upadhyay) की 104वीं जन्म जयंती है. पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक हिंदुत्ववादी विचारक और भारतीय राजनितिज्ञ थे. उन्होंने हिन्दू शब्द को धर्म के तौर पर नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति के रूप में परिभाषित किया है. वह आरएसएस से भी जुड़े रहे. इसी के साथ भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी रहे. राजनीति के अलावा भारतीय साहित्य में भी योगदान दिया. आइए जानते हैं उनके जीवन का एक प्रसंग जो बेहद चर्चित रहा.


दरअसल ये किस्सा सन 1973 कानपुर का है, जब वे छात्र जीवन में थे और कानपुर के सनातन धर्म विद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. तब विद्यालय में अंग्रेजी पढ़ाने वाले अध्यापक ने 1 जनवरी को कक्षा में सभी विद्यार्थियों को नए साल की बधाई दी. दीनदयाल जानते थे कि अध्यापक पर अंग्रेजी संस्कृति का बेहद प्रभाव है, इसीलिए दीनदयाल ने अध्यापक की बधाई पर भरी कक्षा में तपाक से कहा आपके स्नेह के प्रति मेरा सम्मान है आचार्य जी, किन्तु मैं इस नव वर्ष की बधाई नहीं स्वीकारुंगा क्योंकि यह मेरा नववर्ष नहीं है. यह सुनकर वहां मौजूद सभी छात्र स्तब्ध रह गए.


दीनदयाल ने जब बोलना शुरू किया सब निशब्द होकर केवल उन्हें सुनते ही रहे. उन्होंने कहा मेरी संस्कृति के नववर्ष पर तो प्रकृति भी ख़ुशी से झूम उठती है, और यह गुड़ी पड़वा पर आता है. दीनदयाल की बाते सुनकर उनके अध्यापक भी सोचने को मजबूर हो गए और उसके बाद उन्होंने भी कभी अंग्रेजी नववर्ष नहीं मनाया.


बता दें कि राष्ट्र की सेवा में सदैव तत्पर रहने वाले दीनदयाल उपाध्याय का यही उद्देश्य था कि वे अपने राष्ट्र भारत को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षिक क्षेत्रों में बुलंदियों तक पहुंचा देख सकें. वे जातिपात और मजहब की राजनीति के घोर विरोधी और एक सच्चे राष्ट्रवादी थे.


Also Read: एकात्म मानव दर्शन एवं आर्थिक स्वावलंबन के प्रणेता दीन दयाल उपाध्याय


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