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वन नेशन-वन टैक्स की तर्ज पर बने वन नेशन-वन बिल्डर बायर एग्रीमेंट

Ashwini Upadhyay Builder Buyer Agreement

सर्वोच्च न्यायालय सोमवार को देशभर में घर खरीदारों और बिल्डरों के बीच करारनामे का एक समान प्रारूप लागू करने की मांग पर सुनवाई करने के लिए तैयार हो गया है। चीफ जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता भाजपा नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय (Ashwini Upadhyay) को एक हफ्ते में उन राज्यों से जानकारी व निर्देश लाने के लिए कहा है, जहां पहले से मॉडल एग्रीमेंट वजूद में हैं। जस्टिस बोबड़े ने कहा कि 20 राज्यों में करार की शर्तें अलग-अलग हैं। हमें देखना होगा कि केंद्र सरकार कोई मॉडल बना सकती हैं या नहीं?


सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने पीठ से कहा, रेरा के तहत कोई सटीक मॉडल उपलब्ध नहीं है। इस पर पीठ के सदस्य जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम ने कहा कि 20 राज्यों में पहले से ही मॉडल एग्रीमेंट मौजूद है, जिसके बाद विकास सिंह ने जानकारी एकत्र करने के लिए एक हफ्ते का वक्त मांगा। वहीं, कर्नाटक के कुछ होम बायर्स की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने कहा, एग्रीमेंट में एकरूपता न होने से होम बायर्स को परेशानी होती है।


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याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा है कि मॉडल बिल्डर बायर एग्रीमेंट और मॉडल एजेंट बायर एग्रीमेंट से रियल इस्टेट में पारदर्शिता आएगी और फ्लैट खरीदारों को धोखाधड़ी का सामना नहीं करना पडे़गा। वर्तमान में रियल इस्टेट के कई एग्रीमेंट एकतरफा और मनमाने होते हैं। ये एग्रीमेंट फ्लैट खरीदारों के हितों को नजरअंदाज करने वाले हैं। चीफ जस्टिस बोबड़े ने कहा कि हम इस मुद्दे को देंखेंगे, एक हफ्ते बाद सुनवाई करेंगे।


हर राज्य में करार की अलग-अलग शर्तें


बता दें कि हर राज्य में करार की शर्तें अलग-अलग हैं। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि कहीं 20 पेज का तो कहीं 12 पेज का करारनामा बनता है। यह अभी बहुत जटिल होता है, जिसे पूरा पढ़ने के बावजूद उसके कानूनी पेंच समझना आम लोगों के लिए लगभग नामुमकिन है। इसी का फायदा उठाकर कुछ बिल्डर एग्रीमेंट में मनमानी शर्तें जोड़ देते हैं, जिसके असल मायने खरीदार को बाद में पता चलते हैं। करारनामा सिर्फ 2 पेज का भी हो सकता है। अंग्रेजी के बजाय स्थानीय भाषा में हो तो ठीक रहेगा।


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राज्यों के करारनामों में बहुत ज्यादा अंतर है। राज्यों ने अपने-अपने नियम बना रखे हैं। ऐसे कई केस सामने आए हैं जिसमें बिल्डर की मनमान के आगे खरीरदार बेबस दिखे। कोर्ट में पता चलता है कि एग्रीमेंट ही बहुत जटिल बना है।


देखने को मिली ऐसी गड़बड़ियां


याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि उदाहरण के तौर पर ज्यादातर राज्यों में बिल्डर एग्रीमेंट में यह शर्त भी जुड़वा देते हैं कि अगर फ्लैट की किस्त का चेक बाउंस हुआ तो खरीदार को 12 से 18 प्रतिशत ब्याज हर्जाने के रूप में देना होगा। जबकि इस बात का जिक्र कहीं नहीं होता है कि अगर पजेशन 3 के बजाय 5 साल में दिया तो बिल्डर को भी खरीदार से वसूली रकम पर इतना ही ब्याज देना होगा।


एग्रीमेंट में होना चाहिए बिल्डर पर कार्रवाई का नियम


समय पर फ्लैट का पजेशन नहीं देने पर बिल्डर पर कार्रवाई या जुर्माने का कड़ा प्रावधान नहीं है। अगर किसी बिल्डर ने इटालियन टाइल्स, स्वीमिंग पूल इत्यादि का जिक्र किया और वो उसे पूरा नहीं करता है तो उस पर कार्रवाई का नियम एग्रीमेंट में दर्ज नहीं होता। ऐसी कई बाते हैं, जो एग्रीमेंट में जोड़ना बेहद जरूरी है।


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एक जैसा मॉडल होने का फायदा


अगर खरीदार भुगतान करने में देरी करता है या फिर बिल्डर समय पर पजेशन नहीं देता है तो दोनों ही पक्षों पर एक बराबर जुर्माना लगना चाहिए। बिल्डर हवा-हवाई वादे नहीं कर पाएंगे। उदाहरण के तौर पर कई बिल्डर फ्लैट में फाइव स्टार सुविधाएं देने की बात करते हैं, लेकिन ऐसा होता नहीं है।


कैसे बन सकता है एक समान मॉडल?


नया खाका केंद्र को तय करना चाहिए, तभी राज्यों में एक साथ लागू हो सकेगा। यह कम से कम पेज में और स्थानीय भाषा में होना चाहिए।


एक जैसा मॉडल संभव, इससे खरीदार सुरक्षित हो सकेंगे


उत्तर प्रदेश के रेरा प्रमुख राजीव कुमार ने बताया कि अभी जो समस्या है, वह रेरा के गठन के समय निर्माणाधीन प्रोजेक्ट या पहले के प्रोजेक्ट की है। एक मॉडल से खरीदारों के हित सुरक्षित रहेंगे। वहीं, क्रेडाई के चेयरमैन जक्षय शाह ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में प्राेजेक्ट की मंजूरी आदि में काफी समय लगता है। रेरा के ट्रैक रिकॉर्ड को देखकर एक जैसा मॉडल बनता है तो हमें कोई समस्या नहीं है।


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