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किसान आंदोलन अब खुलेआम पॉलिटिकल, प्रोटेस्ट के सहारे UP में सियासी जमीन तलाशने में जुटीं विपक्षी पार्टियां

किसान आंदोलन (Farmer Protest) पर अब पूरी तरह से सियासी रंग चढ़ चुका है, इसके नाते किसानों के मुद्​दे अब पीछे छूट गये. इसकी तस्वीर शुक्रवार को गाजीपुर बॉर्डर से लेकर सिंघु बॉर्डर तक देखने को मिली. विपक्षी राजनीतिक दल के नेता किसान आंदोलन में पहुंचे और वहां पहुंचकर आंदोलन को अपना समर्थन दिया. किसानों के आंदोलन में सपा, कांग्रेस, आप, आरएलडी के नेता भाषण दे रहे हैं. राजनीतिक जानकार इसे यूपी विधानसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं. उनका मानना है विपक्षी पार्टियां अब इस आंदोलन के जरिए यूपी में सियासी जमीन तलाशने में जुट गई हैं.


वैसे किसान आंदोलन को लेकर भारतीय किसान यूनियन भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत (Rakesh Tikait) पर गिरगिट की तरह रंग बदलने का आरोप लगा है. याद करिए टिकैत का वह बयान जो उन्होंने केंद्र द्वारा पारित बिल के बाद चार जून 2020 को उन्होंने दिया था. उस समय उन्होंने कहा था कि किसानों की वर्षों पुरानी मांग हुई. वहीं जब पंजाब के किसानों सरकार के खिलाफ उतरे तो किसान आंदोलन के बने माहौलन में टिकैत भी कूद पड़े, अपने पहले के बयान को भुलाकर कृषि कानून में कमियां गिनाने लग गए.


भाकियू लंबे समय से एक देश एक मंडी की मांग करती रही है. तब उन्होंने सरकार से यह आग्रह किया था कि वह इस बात पर भी नजर रखे कि कहीं किसान के बजाए बिचौलिये सक्रिय होकर उनकी फसल सस्ते दामों में खरीद कर दूसरे राज्यों में न बेचने लगे. उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की थी कि वह एक और कानून लागू करे जिसमें देश में कहीं भी एमएसपी से कम दाम पर किसानों की उपज नहीं बिक सके.


कहने को तो भाकियू गैरराजनीतिक संगठन है. पर मौजूदा समय में पूरा का पूरा आंदोलन राजनेताओं ने हाईजैक कर लिया है. आम आदमी पार्टी सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया जहां राकेश टिकैत के पास गाजीपुर बॉर्डर पहुंचे, तो दिल्ली सरकार में मंत्री सत्येंद्र जैन और दिल्ली जल बोर्ड के उपाध्यक्ष राघव चड्ढा ने सिंघु बॉर्डर पहुंचकर यह जाहिर किया कि वह किसान आंदोलन के समर्थन में खड़े हैं.


कांग्रेस के भी कई नेता किसान आंदोलन में शामिल होने के लिए गाजीपुर बॉर्डर पहुंच गए. फिर चाहें वो कांग्रेसी सांसद दीपेंद्र हुड्डा या प्रताप सिंह बाजवा हों या फिर उत्तर प्रदेश कांग्रेस प्रभारी लल्लू सिंह या फिर कांग्रेस की नेता अलका लांबा. सभी एक-एक कर सुबह से लेकर शाम तक गाजीपुर बॉर्डर पहुंचते रहे और वहां पहुंचकर राकेश टिकैत का समर्थन करते हुए यह बताने की कोशिश की कि कांग्रेस किसान आंदोलन में किसानों के साथ खड़ी है.


हालांकि इसी दौरान जहां राहुल गांधी ने प्रेस कांफ्रेंस कर किसान आंदोलन का समर्थन किया और मोदी सरकार से तीनों कृषि कानून रद्द करने की मांग की. इसी तरह से आरएलडी यानी कि राष्ट्रीय लोक दल के नेता चौधरी अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी भी राकेश टिकैत के पास शुक्रवार सुबह से ही पहुंच गए और राकेश टिकैत के बहते आंसुओं को पोछने का प्रयास भी किया.


अभी तक किसान आंदोलन का केंद्र दिल्ली था, लेकिन गणतंत्र दिवस हिंसा के बाद अब इसका केंद्र पश्चिमी यूपी बन गया है. चूंकि उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, ऐस में कांग्रेस, आप, आरएलडी, सपा, कांग्रेस या हो बसपा सभी राजनीतिक दल खुद को किसानों को हितैषी जताने की कोशिश में लगे हैं. विपक्षी दलों की कवायद किसान आंदोलन के सहारे यूपी में अपनी सियासी जमीन तलाशने की है.


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