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मायावती के करीबी रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी MLC की सदस्यता से अयोग्य घोषित

बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के कभी बेहद करीब रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी (Nasimuddin Siddiqui) विधानसाभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित हो गए हैं. फरवरी 2018 में नेता विधान परिषद BSP की तरफ से सदस्यता को अयोग्य घोषित करने के लिए याचिका सभापति को दी गई थी, जिसपर दोनों पक्षों को कई बार सुनने के बाद सभापति विधानपरिषद ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सदस्यता को आज अयोग्य घोषित कर दिया. 23 जनवरी 2015 को सिद्दीकी BSP के टिकट पर विधान परिषद सदस्य निर्वाचित हुए थे.नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने बीएसपी छोड़ राष्ट्रीय बहुजन मोर्चा बनाया था, जिसके आधार पर दलबदल कानून के तहत सदस्यता अयोग्य घोषित करने के लिए याचिका दी गई थी.


हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने यूपी विधान परिषद के चेयरमैन को बसपा छोड़कर कांग्रेस में आए नसीमुद्दीन सिद्दीकी की विधान परिषद से सदस्यता समाप्त किये जाने की बसपा की अर्जी पर 15 दिन के भीतर फैसला लेने का आदेश दिया था. यह आदेश न्यायमूर्ति पंकज कुमार जायसवाल व न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की खंडपीठ ने दिनेश चंद्रा की ओर से दाखिल याचिका पर पारित किया था.


याचिकाकर्ता की ओर कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि सदस्यता समाप्त करने की मांग वाली अर्जी पर तीन माह के भीतर फैसला सुना देना चाहिए लेकिन यूपी विधान परिषद के चेयरमैन ने 29 मई 2019 को नसीमुददीन सिद्दीकी की सदस्यता समाप्त करने की मांग वाली अर्जी पर सुनवाई पूरी कर अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया था जो कि एक साल पूरा होने के बाद भी नहीं आया.याचिका में कहा गया कि नसीमुददीन बसपा के टिकट पर 23 जनवरी 2015 को विधान परिषद सदस्य बने थे. उन्होने 22 फरवरी 2018 को बसपा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली जिसके बाद नेता बीएसपी विधान परिषद यूपी ने उनकी सदस्यता समाप्त करने के लिए विधान परिषद के चेयरमैन के समक्ष याचिका दी.


कभी आंख मूंदकर भरोसा करती थीं मायावती

नसीमुद्दीन कभी बसपा सुप्रीमो के सबसे खास व बसपा के प्रमुख सिपहसालार में थे. उन्होंने 1988 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. उन्होंने बांदा नगर निगम के अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. इसके बाद उसी साल वो बसपा में शामिल हो गए. 1991 में उन्होंने बसपा के टिकट पर विधायकी का चुनाव लड़ा और उन्हें सफलता हाथ लगी. 1991 में नसीमुद्दीन बसपा के पहले मुस्लिम विधायक बने. हालांकि दो साल बाद 1993 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. लेकिन, जब 1995 में मायावती ने पहली बार मुख्यमंत्री का पद संभाला तो नसीमुद्दीन को कैबिनेट मंत्री बनाया गया. इसके बाद 1997 में भी मायावती के छोटे से कार्यकाल में वो मंत्री रहे. 2002 में भी एक साल के लिए वो कैबिनेट का हिस्सा रहे और फिर 2007 से 2012 में भी उन्होंने मंत्री पद संभाला.


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