पाकिस्तान: भारतीय श्रद्धालुओं के बिना ही मन रही कटासराज मंदिर की महाशिवरात्रि

जहां एक तरफ महाशिवरात्रि का त्यौहार पूरे देश भर में बड़ी आस्था और धूमधाम के साथ मनाया जा रहा है. हर जगह के शिवालयों को फूल मालाओं की झालरों से सजाया गया है. हर कोई भगवान शिव की पूजा-अर्चना और उनकी आस्था में डूबा हुआ है. कांवड़िया अपनी कांवर लेकर भगवान शिव के स्थानों पर पहुँच रहे है. हर जगह के शिव मंदिरों में जलाभिषेक और बेलपत्री चढ़ाई जा रही है. हर तरफ ‘बम बम भोले’ और ‘हर हर महादेव’ के जयकारे गूंज रहे है. भगवान शिव के नाम के भंडारे का प्रसाद हर जगह चल रहा है. वहीं, दूसरी तरफ पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के लाहौर से 280 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बने भगवान शिव के कटासराज मंदिर में आज महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भारत का कोई श्रद्धालु दर्शन करने नहीं पहुंच रहा है. 1 हजार साल से ज्यादा पुराने कटासराज मंदिर पाकिस्तान के सिंध प्रांत के चकवाल जिले में स्थित है.


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पुलवामा हमले के बाद भारतीयों ने नहीं लिया वीजा

जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले के बाद बने तनाव की वजह से श्रद्धालुओं ने पाकिस्तान का वीजा नहीं लिया है. इससे पहले ऐसा 1999 के करगिल युद्ध और 2008 के मुंबई हमले के बाद हुआ था. हालांकि, 1 हजार साल से ज्यादा पुराने मंदिर को महशिवरात्रि के लिए साफ किया गया है. 150 फीट लंबे और 90 फीट चौड़े पवित्र सरोवर का पानी शीशे की तरह साफ दिख रहा है. पिछले 36 सालों से भारतीय जत्था कटासराज मंदिर लेकर जाने वाले सनातन धर्मसभा के संयोजक शिवप्रताप बजाज ने बताया कि भारत के 141 श्रद्धालुओं ने कटासराज जाने के लिए वीजा की अर्जी लगाई थी. लेकिन, पुलवामा हमले के बाद हमने वहां नहीं जाने का फैसला किया है. उन्होंने बताया कि सिंध के कुछ हिंदू परिवार इस बार हमारी ओर से भी भगवान शिव का जलाभिषेक करेंगे. इंडो-पाक प्रोटोकॉल 1972 के अनुसार हर साल 200 भारतीय कटासराज जा सकते हैं.



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भगवान शिव के आंसुओं से बना है मंदिर का कटाक्ष कुंड

मान्यताओं के अनुसार कटासराज मंदिर का कटाक्ष कुंड भगवान शिव के आंसुओं से बना है. कटासराज मंदिर के कटाक्ष कुंड के निर्माण के पीछे एक कथा है कि जब देवी सती की मृत्यु हो गई, तब भगवान शिव उन के दुःख में इतना रोए कि उनके आंसुओं से एक नदी बन गई. जिससे दो कुंड बन गए. जिसमें से एक कुंड राजस्थान के पुष्कर नामक तीर्थ पर है और दूसरा यहां कटासराज मंदिर में.




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कभी पांडवों ने इस मंदिर में बिताया था समय

इस मंदिर का निर्माण छठीं से नवीं शताब्दी के मध्य करवाया गया था. कहा जाता है कि यह मंदिर महाभारत काल (त्रेतायुग) में भी था. इस मंदिर से जुड़ी पांडवों की कई कथाएं प्रसिद्ध हैं. यह भी मान्यता है कि पांडवों ने वनवास के समय यहां कुछ समय बिताया था.



लेकिन, कुछ समय पहले तक इसके पास लगी सीमेंट की फैक्ट्रियां बोरवेल से पानी निकाल रही थीं, जिससे जमीनी पानी का स्तर घटा और सरोवर सूखने की कगार पर पहुंच गया. फिर सिंध के हिंदुओं की याचिका पर पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने सरोवर को ठीक करने के आदेश दिए. साथ ही फैक्ट्रियों पर 10 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया था. फैक्ट्रियों को वहां से हटाने के विकल्प पर भी विचार करने को कहा था. सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद पाक सरकार मंदिर को यूनेस्को की हैरिटेज लिस्ट में लाने के प्रयास कर रही है.



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