बिहार में कांग्रेस का अस्तित्व संकट में! JDU में शामिल हो सकते हैं CONGRESS के सभी 6 विधायक…(1952 से अब तक का चुनावी इतिहास)

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में नई हलचल नजर आ रही है। खबर है कि कांग्रेस के सभी छह विधायक मनोहर प्रसाद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद, अभिषेक रंजन, आबिदुर रहमान, मोहम्मद कामरुल होदा और मनोज विश्वास, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है, तो 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में कांग्रेस का कोई प्रतिनिधित्व नहीं बचेगा। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस के ये विधायक पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट हैं।

‘मनरेगा बचाओ’ अभियान की बैठक में नहीं पहुंचे विधायक 

हाल ही में पटना के सदाकत आश्रम में आयोजित पारंपरिक दही-चूड़ा भोज और 8 जनवरी को ‘मनरेगा बचाओ’ अभियान की बैठक में इन छह विधायकों की अनुपस्थिति भी उनके असंतोष को दर्शाती है। जदयू के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि इन विधायकों के पार्टी में शामिल होने में अब ज्यादा समय नहीं बचा है।

  • बिहार में कांग्रेस की गिरावट 

कांग्रेस का बिहार में सुनहरा दौर (1947-1967)

स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस ने बिहार में लंबे समय तक सत्ता संभाली। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में पार्टी ने राज्य में स्थिरता और जातीय संतुलन बनाए रखा। इस दौर में कांग्रेस ने ऊपरी जातियों के साथ-साथ पिछड़ी जातियों का भी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया।

चुनावी प्रदर्शन इस प्रकार था:

  • 1952: 239 सीटें (330 में से), 41.38% वोट शेयर
  • 1957: 210 सीटें, 42.09% वोट
  • 1962: 185 सीटें, 41% वोट शेयर

पहली बड़ी गिरावट (1967)

1960 के दशक में भूमि सुधार की असफलता और भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण कांग्रेस का लोकप्रियता कम होने लगी। 1967 में कांग्रेस का वोट शेयर 41% से घटकर 33% हो गया और सीटें 128 रह गईं। इस समय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने 86 और 18 सीटें जीतीं। इसके साथ ही बिहार में गैर-कांग्रेस सरकार बनने की प्रक्रिया शुरू हुई।

1970 का दशक, इमरजेंसी और जयप्रकाश नारायण का आंदोलन

1970 के दशक में कांग्रेस की छवि और कमजोर हुई। जयप्रकाश नारायण का ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आंदोलन और 1975-77 की इमरजेंसी ने पार्टी को व्यापक असंतोष का सामना कराया। 1977 के चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 57 सीटें जीत पाई। इस दौरान पिछड़ी जातियों का उभार शुरू हुआ और कांग्रेस को ‘ऊपरी जाति की पार्टी’ के रूप में देखा जाने लगा।

1980 का दशक, अल्पकालिक वापसी

इमरजेंसी के बाद कांग्रेस ने राष्ट्रीय स्तर पर वापसी की और बिहार में भी थोड़ी मजबूती हासिल की। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से सहानुभूति वोट मिले। जगन्नाथ मिश्रा के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1985 में 196 सीटें जीतीं, लेकिन भ्रष्टाचार और OBC असंतोष ने पार्टी की नींव कमजोर की।

1990: सबसे बड़ा बदलाव

1990 में बिहार में कांग्रेस का सफर तेजी से नीचे जाने लगा। लालू प्रसाद यादव के उदय और OBC राजनीति के उभार ने कांग्रेस को सत्ता से दूर कर दिया। 1990 के चुनाव में कांग्रेस 71 सीटें जीत पाई, जबकि RJD ने सत्ता पर कब्जा किया। इस समय से कांग्रेस कभी भी बिहार में सरकार बनाने में सफल नहीं रही।

1995 से अब तक, लगातार गिरावट

क्षेत्रीय दल (RJD, JD(U), BJP) हावी। कांग्रेस गठबंधनों पर निर्भर, लेकिन आधार खोया।

  • 1995: 29/324 सीटें (16% वोट) – लालू की RJD 146 सीटें।
  • 2000: 23/324 सीटें (11% वोट)।
  • 2005: 9-10/243 सीटें (6% वोट) – NDA उदय।
  • 2010: सिर्फ 4/243 सीटें (8% वोट) – सबसे खराब।
  • 2015: महागठबंधन में 27/243 सीटें (7% वोट) – अस्थायी सुधार, लेकिन गठबंधन टूटा।
  • 2020: 19/243 सीटें (9.5% वोट) – महागठबंधन में।
  • 2025: सिर्फ 6/243 सीटें (61 लड़ीं, स्ट्राइक रेट 10%, 9.8% वोट)।
  • 2025: NDA ने 202/243 सीटें जीतीं (BJP 89, JD(U) 85, LJP(RV) 19 आदि)।
  • 2025: महागठबंधन सिर्फ 35 सीटें (RJD 25, कांग्रेस 6)।
  • 2025: कांग्रेस ने 61 सीटें लड़ीं, लेकिन AIMIM (5 सीटें) से भी पीछे रही।

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