UP: प्रयागराज (Prayagraj) स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि दो वयस्कों के बीच सहमति से संबंध बने हों और बाद में विवाह न हो पाए, तो मात्र इसी आधार पर इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला अलीगढ़ निवासी जितेंद्र पाल और दो अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान आया। गांधी पार्क थाने में दर्ज एफआईआर में पीड़िता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने विवाह का झूठा आश्वासन देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। साथ ही, याचिकाकर्ता के भाई और भाभी पर आपराधिक धमकी देने का भी आरोप लगाया गया था। पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की धारा 69 और 351(2) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।
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लंबे समय का सहमति आधारित रिश्ता
एफआईआर के अनुसार, पीड़िता और आरोपी वर्ष 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे और कॉलेज के समय से उनके बीच प्रेम संबंध था। वर्ष 2021 से दोनों के बीच शारीरिक संबंध बने, जो नवंबर 2024 तक जारी रहे। कोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि दोनों वयस्क, शिक्षित और समझदार थे तथा उनका रिश्ता लंबे समय तक आपसी सहमति से चला।
धोखाधड़ी की मंशा का अभाव
जस्टिस अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि विवाह का वादा शुरू से ही छलपूर्वक किया गया था। जांच के दौरान जबरन गर्भपात से जुड़े आरोप भी प्रमाणित नहीं हो सके, जिसके चलते उस धारा में चार्जशीट दाखिल नहीं की गई। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल विवाह न होना अपने आप में अपराध नहीं है।
चार्जशीट और पूरी कार्रवाई रद्द
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि लंबे समय तक सहमति से बने संबंधों को बाद में विवाह न होने के आधार पर अपराध नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, याची के भाई और भाभी के खिलाफ धमकी के आरोपों के समर्थन में भी कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं मिला। इन सभी कारणों से कोर्ट ने 30 मार्च 2025 की चार्जशीट, 22 मई 2025 के संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

















































