माघ मेला में विवाद,अविमुक्तेश्वरानंद के रथ पर प्रहार!

प्रयागराज में जारी माघ मेले में मौनी अमावस्या पर आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा था। मेला प्रशासन के अनुसार, माघ मेले पर करीब 1.9 करोड़ श्रद्धालुओं ने गंगा और यमुना के संगम में आस्था की डुबकी लगाई। इस बीच प्रयागराज में महाराज अविमुक्तेश्वरानंद के स्नान के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। जो अब सियासी गलियारों तक जा पहुंची है। दरअसल मौनी अमावस्या के दिन प्रयागराज स्थित संगम नोज पर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। संगम पर पवित्र स्नान के लिए जुटे श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली, जिसके चलते प्रशासन को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। इसी बीच ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के जुलूस को लेकर हालात तनावपूर्ण हो गए।

पुलिस और शंकराचार्य के समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की

इस दौरान पुलिस और शंकराचार्य के समर्थकों के बीच धक्का-मुक्की की स्थिति बन गई। सन ने भीड़ के दबाव और सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को संगम नोज की ओर रथ से आगे बढ़ने से रोक दिया गया। इस दौरान अधिकारियों ने उनसे रथ से उतरकर पैदल जाने का आग्रह किया, लेकिन शंकराचार्य और उनके समर्थक इस बात पर राजी नहीं हुए। समर्थक आगे बढ़ने लगे, जिससे मौके पर मौजूद पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और झड़प हो गई।

प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर मौजूद 

हालात बिगड़ते देख प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी मौके पर पहुंचे और स्थिति को संभालने की पूरी कोशिश की गई। इसके बावजूद शंकराचार्य रथ से ही जाने की जिद पर अड़े रहे और फिर उन्होंने स्नान करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने उन्हें स्नान नहीं करने दिया, इसलिए वह वापस जा रहे हैं।

अविमुक्तेश्वरानंद का बयान

अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा,प्रशासन ने मना किया और हम रुक गए। रुककर बातचीत की गई हमने कहा कि आपको जो सहयोग चाहिए, हम करने को तैयार हैं। हम 100 से 125 लोग हैं, जो साथ में नहाते हैं। आप कहिए तो हम एक लाइन बना देते हैं। आपका एक आदमी आगे चले, हम पीछे-पीछे चल लेंगे। कोई भगदड़ नहीं मचेगी, लेकिन अधिकारी नहीं मान रहे हैं। फिर मैंने लौटने का जब निर्णय लिया तो मैंने देखा कि बड़े-बड़े अधिकारी हमारे संतों को मार रहे थे। हमने देखा, जब हम लौट रहे थे तो पुलिस का एक दल आया और धावा करके हमारे संतों को मारने लगा।

अफसरों को ऊपर से आदेश मिला होगा: अविमुक्तेश्वरानंद 

शंकराचार्य ने कहा अफसरों को ऊपर से आदेश मिला होगा कि इन्हें परेशान करो। यह सरकार के इशारे पर हो रहा है, वो हमसे नाराज है। जब महाकुंभ में भगदड़ मची थी, तो मैंने उन्हें जिम्मेदार ठहराया था। अब वे बदला निकालने के लिए अधिकारियों से कह रहे होंगे। उन्हें खुश करने के लिए अधिकारी हमारा अपमान करना चाहते हैं। वहीं इस पूरी घटना के बाद से ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अनशन पर बैठे हुए हैं।

शंकराचार्य की मांग

माघ मेले में गंगा नदी के उस पार सेक्टर चार में त्रिवेणी रोड पर ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का शिविर स्थित है। शिविर के बाहर ही उन्होंने दण्ड तर्पण और पूजन भी किया है। शंकराचार्य की मांग है कि प्रशासन प्रोटोकॉल के साथ उन्हें ले जाकर गंगा स्नान कराए। रविवार को संगम नोज पर भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने कम संख्या में पैदल जाकर स्नान करने की पेशकश की थी। प्रशासन से बात न बनने के चलते संगम नोज वॉच टावर के पास जमकर हंगामा भी हुआ था। इसके बाद शंकराचार्य को पुलिस प्रशासन ने बैरंग वापस लौटा दिया था।

सियासी गलियारों तक इस विवाद ने तूल पकड़ लिया है

एक्स पर एक पोस्ट करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि माघमेला क्षेत्र में पिछले साल की तरह ही इस साल फिर से साधु-संतों-भक्तों के साथ हुआ दुर्व्यवहार अक्षम्य है। सदियों से चली आ रही शाही-स्नान की अखंड सनातनी परंपरा में गत वर्ष भी इसी सरकार द्वारा विघ्न डाला गया था. प्रश्न ये है कि ऐसी घटनाएं भाजपा की सरकार में ही क्यों हो रही है। मौनी अमावस्या का शाही-स्नान क्या पहली बार हो रहा है। इस अवस्था के लिए भाजपा का कुशासन और नाकाम व्यवस्था ही दोषी है। मुख्य को हर जगह ‘मुख्य’ बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। अहंकारी भाजपाई शासन और प्रशासन अपने से बड़ा किसी को नहीं मानता है। अब क्या इसका दोष भी ‘एआई’ पर मढ़ेंगे? यदि उत्तर प्रदेश के गृह सचिव मनमानी कर रहे हैं तो भी गलत है और अगर किसी के निर्देश पर कर रहे हैं तो और भी गलत है। पूरे मामले की जांच हो! ये घोर निंदनीय!

कौन है स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ पीठ के वर्तमान शंकराचार्य है। वह उत्तराखंड के हरिद्वार में स्थित इस पीठ के प्रमुख हैं। । उनका जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में 15 अगस्त 1969 को हुआ था। उनका मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय था। उन्होंने वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की शिक्षा ग्रहण की और फिर 15 अप्रैल 2003 को दंड सन्यास की दीक्षा ली। इसी दौरान जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से उन्हें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का नया नाम मिला।

Input- Ananya Mishra

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