लखनऊ : उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) राजीव कृष्ण ने सभी पुलिस अधिकारियों को सख्त निर्देश जारी किए हैं कि जिन मामलों में कानून के तहत केवल परिवाद (शिकायत) का प्रावधान है, उनमें एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह गलत और नियम-विरुद्ध है।
यह निर्देश इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ द्वारा इस विषय पर आपत्ति जताए जाने के बाद जारी किया गया है। डीजीपी ने कहा कि कई बार पुलिस बिना कानूनी प्रावधान के एफआईआर दर्ज कर लेती है, जिससे आरोपी को बाद में न्यायालय में लाभ मिल जाता है और पूरी जांच प्रक्रिया प्रभावित हो जाती है।
डीजीपी का साफ संदेश
डीजीपी राजीव कृष्ण ने अपने निर्देश में स्पष्ट किया है कि किसी भी मामले में एफआईआर दर्ज करने से पहले पुलिस अधिकारी अनिवार्य रूप से यह जांच करें कि संबंधित अपराध में एफआईआर दर्ज करने का कानूनी प्रावधान है या नहीं। यदि केवल परिवाद (शिकायत) का प्रावधान है तो सीधे एफआईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि हाईकोर्ट की टिप्पणी को गंभीर त्रुटि मानते हुए अब ऐसी गलतियों पर सख्ती बरती जाएगी।
कारण और प्रभाव
डीजीपी ने पुलिस अधिकारियों को चेतावनी दी है कि गलत तरीके से एफआईआर दर्ज करने से न केवल आरोपी को फायदा पहुंचता है, बल्कि जांच की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है। इससे न्याय प्रक्रिया में देरी होती है और कई बार मामला कमजोर पड़ जाता है।
यह निर्देश उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहां IPC या अन्य कानूनों में केवल शिकायत दर्ज करने का प्रावधान है, लेकिन पुलिस बिना जांच के सीधे एफआईआर दर्ज कर देती है।
पुलिस के लिए नया दिशा-निर्देश
डीजीपी राजीव कृष्ण ने सभी पुलिस इकाइयों को निर्देश दिया है कि अब से एफआईआर दर्ज करने से पहले कानूनी प्रावधान की सावधानीपूर्वक जांच की जाए। यदि कोई अधिकारी नियमों का उल्लंघन करता पाया गया तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
यह कदम उत्तर प्रदेश पुलिस में कानूनी प्रक्रिया की शुचिता और अनुशासन बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
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