नोएडा का ‘श्राप’ तोड़ने की तैयारी में अखिलेश यादव: 28 मार्च से PDA रैली के साथ शुरू होगा 2027 चुनाव अभियान, जहां मायावती-अखिलेश डरते थे, वहां से सपा करेगी सियासी हमला

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नोएडा को लंबे समय से ‘मुख्यमंत्री का श्राप’ माना जाता रहा है—जो सीएम वहां गया, उसकी कुर्सी चली गई। वीर बहादुर सिंह से लेकर मायावती और अखिलेश यादव तक, कई नेता नोएडा जाने से डरते रहे। लेकिन अब अखिलेश यादव इसी ‘श्राप’ को तोड़ने की ठान चुके हैं। उन्होंने 28 मार्च 2026 को नोएडा से 2027 विधानसभा चुनाव अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। यह PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) भागीदारी रैली होगी, जहां सपा अपना फॉर्मूला भी लॉन्च करेगी। योगी आदित्यनाथ ने पहले ही इस मिथक को तोड़ा है, अब अखिलेश की बारी है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में नोएडा का नाम हमेशा से एक ‘रहस्य’ या ‘श्राप’ के रूप में लिया जाता रहा है। कई पूर्व मुख्यमंत्री जैसे वीर बहादुर सिंह, नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह और यहां तक कि मायावती व अखिलेश यादव भी नोएडा जाने से कतराते रहे। मान्यता थी कि जो मुख्यमंत्री नोएडा जाता है, उसकी कुर्सी चली जाती है। इसे ‘नोएडा जिंक्स’ कहा जाता था। लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई बार नोएडा दौरा कर इस मिथक को तोड़ा और कहा कि बीजेपी सरकार ने इस ‘कर्स’ को खत्म कर दिया है। अब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसी नोएडा से 2027 विधानसभा चुनाव अभियान शुरू करने का फैसला कर सभी को चौंका दिया है।

अखिलेश यादव 28 मार्च 2026 को नोएडा में PDA भागीदारी रैली का आयोजन करेंगे। यह रैली सपा की चुनावी रणनीति का आगाज होगी, जहां पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) फॉर्मूले पर जोर दिया जाएगा। पार्टी सूत्रों का कहना है कि यह कदम नोएडा के ‘श्राप’ को तोड़ने का संकेत है। अखिलेश ने साफ कहा है कि वे से नहीं डरते और नोएडा अब सपा की जीत का प्रतीक बनेगा। इस रैली से सपा पश्चिमी यूपी में अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की कोशिश करेगी, जहां 2022 चुनाव में पार्टी को करारी हार मिली थी।

नोएडा के इस ‘रहस्य’ की शुरुआत 1980-90 के दशक से मानी जाती है। पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह 1988 में नोएडा गए और कुछ महीनों बाद सत्ता से बाहर हो गए। इसी तरह नारायण दत्त तिवारी, कल्याण सिंह और मायावती भी नोएडा दौरे के बाद चुनाव हारे या सत्ता गंवाई। अखिलेश यादव भी 2012-2017 के अपने कार्यकाल में नोएडा से दूरी बनाए रखे। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने 2017 से कई बार नोएडा का दौरा किया और 2022 में दोबारा चुनाव जीते, जिससे इस मिथक का अंत हुआ। अखिलेश का यह कदम योगी को चुनौती देने का भी संकेत माना जा रहा है।

समाजवादी पार्टी ने 2027 चुनाव की तैयारियां लगभग 11 महीने पहले ही शुरू कर दी हैं। अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी को विशेष महत्व दे रहे हैं, जहां नोएडा-ग्रेटर नोएडा जैसे इलाके सपा के लिए कमजोर रहे हैं। 2022 में गौतमबुद्धनगर जिले की सभी सीटों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की थी। PDA फॉर्मूले से सपा सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश कर रही है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नोएडा से अभियान शुरू करना सपा की आक्रामक रणनीति का हिस्सा है, जो 2027 की जंग में नई ऊर्जा ला सकता है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश (नोएडा, गाजियाबाद, मेरठ, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, आगरा, अलीगढ़, बुलंदशहर, हाथरस, मथुरा आदि) 2027 विधानसभा चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाने वाला क्षेत्र है। यहां की 100 से ज्यादा सीटें किसी भी पार्टी के लिए सरकार बनाने या रोकने में अहम हैं। 2022 में BJP ने इस क्षेत्र में जबरदस्त प्रदर्शन किया था, लेकिन अब अखिलेश यादव PDA (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ वापसी की कोशिश में हैं। वहीं BJP विकास, कानून-व्यवस्था और हिंदुत्व के मुद्दे पर मजबूत स्थिति में है। आइए समझते हैं 2027 के लिए पश्चिमी यूपी की सियासी रणनीति।

1. नोएडा से अखिलेश का सियासी दांव

अखिलेश यादव ने 28 मार्च 2026 को नोएडा से PDA भागीदारी रैली के साथ चुनाव अभियान शुरू करने का ऐलान किया है। यह कदम इसलिए अहम है क्योंकि:
नोएडा को पिछले कई सालों से “मुख्यमंत्री का श्राप” माना जाता रहा है।
अखिलेश और मायावती दोनों ही मुख्यमंत्री रहते नोएडा जाने से कतराते थे।
योगी आदित्यनाथ ने कई बार नोएडा दौरा कर इस मिथक को तोड़ा और 2022 में भी जीत दर्ज की।

2. PDA फॉर्मूला पर सपा का फोकस

सपा इस बार PDA (पिछड़ा + दलित + अल्पसंख्यक) को पूरी ताकत से आगे कर रही है। पश्चिमी यूपी में:
जाट, गुर्जर, राजपूत, ब्राह्मण, वैश्य – जातीय समीकरण बहुत मजबूत हैं।
मुस्लिम वोटर कई जिलों (मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, बिजनौर, मेरठ, रामपुर) में निर्णायक हैं।
दलित वोटर (जाटव + गैर-जाटव) को साधने की कोशिश तेज है।
अखिलेश की रणनीति है कि PDA के जरिए 2022 की हार (जहां सपा को पश्चिमी यूपी में बहुत कम सीटें मिलीं) को पलटना।

3. BJP की मजबूत स्थिति और रणनीति

बीजेपी पश्चिमी यूपी में अभी भी मजबूत स्थिति में है। उनकी रणनीति में ये बातें शामिल हैं:
योगी आदित्यनाथ का व्यक्तिगत करिश्मा और कानून-व्यवस्था का मुद्दा
विकास परियोजनाएं (एक्सप्रेसवे, मेट्रो, जेवर एयरपोर्ट, फिल्म सिटी, निवेश)
हिंदुत्व और राम मंदिर का प्रभाव (मथुरा-आगरा-मेरठ में)
जाट-गुर्जर-राजपूत-ब्राह्मण को साधने के लिए जातिगत समीकरण पर काम
नोएडा-ग्रेटर नोएडा में शहरी मध्यम वर्ग का मजबूत समर्थन

4. प्रमुख जिले और उनकी सियासी तस्वीर

नोएडा-ग्रेटर नोएडा: शहरी, उच्च मध्यम वर्ग, बीजेपी मजबूत। सपा PDA से चुनौती देगी।
मेरठ-मुजफ्फरनगर-सहारनपुर: मुस्लिम + जाट + दलित का मिश्रण। 2013 दंगे का असर अभी भी है।
आगरा-मथुरा: राम मंदिर और कृष्ण जन्मभूमि का मुद्दा BJP को फायदा देता है।
अलीगढ़: AMU और मुस्लिम वोटर महत्वपूर्ण। सपा यहां मजबूत रहती आई है।
बुलंदशहर-हाथरस: जाट + दलित + ब्राह्मण का खेल।

5. 2027 में पश्चिमी यूपी का गणित

कुल सीटें: लगभग 100–110

2022 में BJP ने 80+ सीटें जीतीं, सपा को 10–15 के आसपास मिलीं।
अगर सपा PDA से 30–40% सीटें भी पलट लेती है, तो BJP के लिए सरकार बनाना मुश्किल हो सकता है।
अगर BJP 60–70 सीटें भी बरकरार रखती है, तो पश्चिमी यूपी में उसकी स्थिति मजबूत रहेगी।

गौरतलब है कि 2022 विधानसभा चुनाव में गौतमबुद्धनगर (नोएडा) ज़िले की सभी सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी, जबकि समाजवादी पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल पाई थी। ऐसे में नोएडा से चुनावी अभियान शुरू करना सपा की बदली हुई रणनीति और आक्रामक तेवरों का संकेत माना जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि PDA फ़ॉर्मूले के ज़रिए अखिलेश यादव सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले महीनों में सपा का यह शुरुआती चुनावी अभियान उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए सियासी संकेत दे सकता है। 2022 विधानसभा चुनाव में नोएडा-ग्रेटर नोएडा क्षेत्र की स्थिति (गौतम बुद्ध नगर जिले की मुख्य सीटें):
गौतम बुद्ध नगर जिले में मुख्य विधानसभा सीटें हैं: नोएडा, दादरी, और जेवर (ग्रेटर नोएडा क्षेत्र)। 2022 में इन सभी पर बीजेपीने पूरी तरह कब्जा जमाया था, और सपा को एक भी सीट नहीं मिली।

 

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