कुरुक्षेत्र
नौ सेकेंड… बस इतना ही वक्त लगता है हरिकेश पपोसा को किसी के सिर पर हरियाणवी पगड़ी सजाने में।
हाथों की फुर्ती ऐसी कि कपड़े की लंबी पट्टी देखते ही देखते हरियाणा की आन-बान-शान का प्रतीक बन जाती है। सिर पर सजती पगड़ी के साथ मेहमानों के चेहरे पर मुस्कान और हरियाणवी संस्कृति के प्रति सम्मान भी नजर आता है।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के यूआइईटी में लैब सहायक हरिकेश पपोसा के लिए यह महज एक हुनर नहीं, बल्कि अपनी माटी की पहचान को देश-दुनिया तक पहुंचाने का जुनून है।
अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस पर उनकी यह कला बताती है कि परंपराओं की ताकत और हुनर की चमक किसी परिचय की मोहताज नहीं होती।
अंतरराष्ट्रीय गीता महोत्सव हो या कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का रत्नावली महोत्सव, पपोसा के पास हरियाणवी पगड़ी बंधवाने के लिए देश-विदेश से आए पर्यटकों की भीड़ जुटती है।
कोई हरियाणा की संस्कृति को करीब से महसूस करने के लिए पगड़ी बंधवाता है तो कोई इस यादगार पल को कैमरे में कैद कर लेता है। महज नौ सेकेंड में तैयार होने वाली पगड़ी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाती है। यही वजह है कि महोत्सवों में पपोसा का हुनर हरियाणा की लोक संस्कृति का खास आकर्षण बन चुका है।
जी-20 समिट से प्रधानमंत्री के आगमन तक छाई पगड़ी
हरियाणवी पगड़ी को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में भी पपोसा की कला की अहम भूमिका रही है। नई दिल्ली में आयोजित जी-20 समिट के दौरान उन्होंने अफ्रीकी महाद्वीप से आए प्रतिनिधियों को हरियाणवी पगड़ी पहनाकर स्वागत किया।
इसके अलावा मारीशस के राष्ट्रपति, भारत के उपराष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों, विभिन्न प्रदेशों के राज्यपालों व मुख्यमंत्रियों और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी वह पगड़ी पहना चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुरुक्षेत्र आगमन के दौरान भी उनके हाथों से तैयार हरियाणवी पगड़ी ने प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को खास अंदाज में प्रस्तुत किया।
कपड़े की पट्टी से समेट देते हैं हरियाणवी पहचान
पपोसा की खासियत केवल तेजी से पगड़ी बांधना नहीं, बल्कि उसके पारंपरिक स्वरूप और सलीके को बनाए रखना भी है। पगड़ी का हर मोड़, उसकी कसावट और सिर पर उसका संतुलन उनके अभ्यास और अनुभव को दर्शाता है।
गीता जयंती महोत्सव, रत्नावली और ऑल इंडिया फाइनेंस सेक्रेटरी जैसे आयोजनों में भी वह विशिष्ट अतिथियों को हरियाणवी पगड़ी पहना चुके हैं।
हुनर से जीवंत रख रहे लोक परंपरा
आज के दौर में जब लोक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना बड़ी चुनौती है, तब पपोसा जैसे कलाकार अपने हुनर से इन्हें जीवंत बनाए हुए हैं। उनके लिए पगड़ी कपड़े का एक टुकड़ा नहीं, बल्कि हरियाणा की संस्कृति, स्वाभिमान और अतिथि सत्कार का प्रतीक है।
अंतरराष्ट्रीय कलाकार दिवस पर उनका योगदान इस बात की मिसाल है कि कलाकार अपनी कला के माध्यम से बिना शब्दों के भी अपनी मिट्टी की कहानी दुनिया को सुना सकता है। नौ सेकेंड में सिर पर सजने वाली यह पगड़ी दरअसल सदियों पुरानी परंपरा और हरियाणवी गौरव की पहचान है।














