कानपुर का किडनी स्कैंडल: मौत के सौदागरों का खौफनाक खेल!

उत्तर प्रदेश का कानपुर एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार कोई अच्छी खबर नहीं। शहर के बीचों-बीच, चमचमाते अस्पतालों की चारदीवारी में चल रहा था अंगों की तस्करी का सबसे बड़ा और खतरनाक रैकेट। यह कोई साधारण मामला नहीं था। इसमें शामिल थे, एम्बुलेंस ड्राइवर से लेकर नामी-गिरामी डॉक्टर तक। और सबसे हैरान करने वाली बात? पूरे साजिश की कमान संभाल रहा था एक आठवीं पास जालसाज, जो गले में स्टेथोस्कोप लटकाकर खुद को ‘डॉक्टर’ बताता था!

पुलिस कमिश्नर रघुवीर लाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब इस रैकेट की परतें उधेड़ीं, तो सुनने वालों के भी होश उड़ गए। पिछले साल ही पुलिस को इस गैंग की भनक लग गई थी। लेकिन अपराधी इतने शातिर थे कि मुख्य अस्पताल तक पहुँचना पुलिस के लिए मुश्किल हो रहा था। आखिरकार, सीएमओ और डीसीपी की टीम ने जब आरोही हॉस्पिटल को सीज किया, तब जाकर असली खेल शुरू हुआ। एक-एक करके कड़ियाँ जुड़ती गईं और जांच की आंच पहुची आहूजा हॉस्पिटल तक।

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला किरदार है , शिवम अग्रवाल उर्फ काना। कागजों पर तो वह सिर्फ आठवीं पास है और एम्बुलेंस चलाता है। लेकिन हकीकत कुछ और थी। गले में स्टेथोस्कोप डालकर वह अमीर मरीजों के सामने “डॉक्टर साहब” बन जाता था। मरीजों को फुसलाकर, डराकर या लालच देकर वह उन्हें इस खतरनाक जाल में फँसाता था। शिवम की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने पूछताछ शुरू की, तो सामने आया एक ऐसा नेटवर्क जिसने कानपुर को किडनी तस्करी का हब बना दिया था।

रैकेट हाईटेक तरीके से चलाया जा रहा था। मेरठ का डॉक्टर अफजाल इस पूरे गैंग का डिजिटल ब्रेन था। उसने टेलीग्राम पर एक सीक्रेट ग्रुप बनाया था, जहाँ किडनी डोनर और रिसीवर का खुलेआम सौदा होता था। उदाहरण के तौर पर रिसीवर पारुल तोमर, जिनकी दोनों किडनियाँ खराब। और डोनर आयुष  बिहार के समस्तीपुर का MBA फाइनल ईयर का छात्र। डॉक्टर अफजाल इसी ग्रुप के जरिए पैसे की डील फाइनल करता और ऑपरेशन की तारीख तय कर देता।

कानपुर में अब तक 40 से 50 ऐसे अवैध किडनी ट्रांसप्लांट हो चुके थे। एक साउथ अफ्रीकी महिला का भी ऑपरेशन यहीं हुआ था। आहूजा हॉस्पिटल में अकेले 7-8 सर्जरी हो चुकी थीं। ऑपरेशन का तरीका देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जिस दिन सर्जरी होनी होती, पूरे अस्पताल का स्टाफ छुट्टी पर भेज दिया जाता। डॉ. रोहित अपनी “स्पेशल टीम” के साथ आते और रात के अंधेरे में ऑपरेशन कर देते।

ऑपरेशन खत्म होते ही डोनर और रिसीवर को अलग-अलग अस्पतालों में शिफ्ट कर दिया जाता, ताकि कोई कनेक्शन न बन सके। और सबसे डरावनी बात  इन मरीजों की कोई मेडिकल हिस्ट्री या रिकॉर्ड ही नहीं रखा जाता था! इस मामले में पुलिस ने अब तक डॉ. सुरजीत सिंह आहूजा और डॉ. प्रीति आहूजा (आहूजा हॉस्पिटल के मालिक), शिवम अग्रवाल उर्फ काना, नरेंद्र सिंह, राम प्रकाश कुशवाहा और राजेश कुमार (आरोही हॉस्पिटल के पूर्व संचालक) को गिरफ्तार किया है।

कानपुर पुलिस की इस बड़ी कार्रवाई ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक आठवीं पास शख्स कैसे शहर के बड़े-बड़े अस्पतालों में सर्जरी फिक्स करवा रहा था? क्या स्वास्थ्य विभाग सो रहा था ? फिलहाल पुलिस डॉ. रोहित और डॉक्टर अफजाल की तलाश में छापेमारी कर रही है। उम्मीद है कि जल्द ही इस गैंग के बाकी “सफेदपोश” चेहरे भी बेनकाब हो जाएंगे।

कानपुर का यह किडनी स्कैंडल सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ सबसे बड़ा खौफनाक साजिश है। जिस समाज में अमीर अपनी जान बचाने के लिए गरीबों की किडनी खरीद रहा हो, वह समाज कितना बीमार है — इस पर सोचने का वक्त आ गया है।

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