लखनऊ: KGMU परिसर में हरमैन शाह मजार के पास फिर अवैध कब्जे की कोशिश, बांस-बल्ली लगाकर घेराबंदी, प्रशासन ने पुलिस से की शिकायत

लखनऊ: किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) परिसर में हरमैन शाह (या हाजी हरमैन शाह बाबा) मजार के आसपास फिर से अवैध कब्जे की कोशिश सामने आई है। सूत्रों के अनुसार, होली के दौरान गाड़ियों की संख्या कम होने का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने मजार के निकट क्षेत्र में बांस-बल्ली लगाकर घेराबंदी कर ली है। यह इलाका पहले कब्जा हटाने के बाद पार्किंग के लिए इस्तेमाल हो रहा था, लेकिन अब दोबारा अतिक्रमण की कोशिश से प्रशासन में हड़कंप मच गया है। KGMU प्रशासन ने इसकी शिकायत पुलिस से की है और सतर्क होकर कार्रवाई की तैयारी कर रहा है।

 जनवरी-फरवरी 2026 का पुराना विवाद

यह मामला नया नहीं है। जनवरी 2026 में KGMU प्रशासन ने परिसर में मौजूद कई मजारों (कुल 5-6) को अवैध निर्माण और अतिक्रमण बताते हुए नोटिस चस्पा किए थे। इनमें हरमैन शाह मजार का नाम स्पष्ट रूप से शामिल नहीं था, प्रशासन ने कहा था कि शाह मीना शाह और हरमैन शाह जैसी पुरानी मजारों पर कोई नोटिस नहीं जारी किया गया, बल्कि पिछले 40-50 सालों में बनी अन्य संरचनाओं पर कार्रवाई का लक्ष्य था। 15 दिनों का समय दिया गया था कि अतिक्रमण हटाया जाए, अन्यथा बुलडोजर चलेगा। फरवरी में दूसरा नोटिस भी जारी हुआ, लेकिन हरमैन शाह मजार पर रमजान के दौरान रोजेदारों के लिए इफ्तार का आयोजन जारी रहा। मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया और इसे धार्मिक स्थल बताते हुए कार्रवाई का विरोध किया था।

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नई घटना का विवरण

एक साल बाद (या हाल के महीनों में) फिर वही जगह विवाद में है। होली पर वाहनों की कम आवाजाही का फायदा उठाकर मजार के पास बांस-बल्ली से घेरा लगा दिया गया। यह क्षेत्र पहले कब्जा हटाने के बाद पार्किंग में बदल गया था, लेकिन अब दोबारा कब्जे की कोशिश से मरीजों और स्टाफ की परेशानी बढ़ सकती है। KGMU प्रशासन का कहना है कि यह सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण है, जो परिसर की आवाजाही और पार्किंग को प्रभावित करता है। पुलिस को सूचना दी गई है, और जल्द कार्रवाई की उम्मीद है ताकि स्थिति नियंत्रण में रहे।

विवाद के दोनों पक्ष

  • प्रशासन का पक्ष: KGMU का दावा है कि मजारों के आसपास अतिक्रमण से मरीजों की आवाजाही बाधित होती है, पार्किंग की समस्या बढ़ती है और परिसर की सुरक्षा प्रभावित होती है। वे कोर्ट के आदेशों और सरकारी नियमों का हवाला देते हैं।
  • विरोधियों का पक्ष: मजार कमेटी और धार्मिक संगठन इसे सैकड़ों साल पुरानी सूफी परंपरा बताते हैं। उनका कहना है कि हरमैन शाह जैसी मजारें धार्मिक महत्व की हैं और इन्हें हटाना आस्था पर हमला है। रमजान में इफ्तार आयोजन से भी विवाद बढ़ा था।

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