एमपी के सरकारी अस्पतालों में अब MBBS डॉक्टर करेंगे अल्ट्रासाउंड, रेडियोलॉजिस्ट की कमी दूर करने की तैयारी

भोपाल
 प्रदेश के जिला-सिविल अस्पतालों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में रेडियोलॉजिस्ट की कमी दूर करने के लिए सरकार विकल्पों पर काम कर रही है। नई योजना के तहत उन अस्पतालों में पदस्थ एमबीबीएस डॉक्टरों को छह महीने के विशेष प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है।

इस प्रशिक्षण के बाद वे पेट और पेल्विक का अल्ट्रासाउंड कर सकेंगे। इससे जरूरतमंद मरीजों की समय से जांच हो पाएगी, पैसा बचेगा और भटकना नहीं पड़ेगा। यह प्रशिक्षण जिला अस्पताल के अलावा मेडिकल कॉलेजों के एमबीबीएस डॉक्टरों को भी दिया जाएगा।

मरीजों को होती है परेशानी
बता दें कि गांव और छोटे शहरों के अस्पतालों में मशीनें हैं लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की कमी है। डॉक्टर पर्ची पर अल्ट्रासाउंड लिख देते हैं, लेकिन अस्पताल में जांच होती नहीं। मरीज को कहा जाता है कि बाहर से करा लाओ। गर्भवती महिला को तो हर बार जांच के लिए प्राइवेट सेंटर जाना पड़ता है। वहां 800 से 1500 रुपये तक खर्च हो जाता है।

कई बार रिपोर्ट के लिए दो-तीन दिन इंतजार करना पड़ता है। इसी इंतजार में इलाज लेट हो जाता है। इस पहल से अब मरीज को भटकना नहीं पड़ेगा। उसी अस्पताल में जांच होगी, उसी दिन रिपोर्ट मिलेगी और पैसा भी बचेगा।

वरिष्ठ रेडियोलॉजिस्ट डॉ. शैलेष लुनावत का कहना है कि बेसिक जांच के लिए छह महीने की सही ट्रेनिंग काफी है, लेकिन डॉक्टर को अपनी सीमा पता होनी चाहिए। मुश्किल केस में सीनियर से सलाह लेनी ही होगी।

रेडियोलॉजिस्ट की कमी
मप्र के सरकारी अस्पतालों में कुल 22 रेडियोलॉजिस्ट है। हर साल हजारों डॉक्टर एमबीबीएस करते हैं, लेकिन रेडियोलॉजी की एमडी सीटें बहुत कम हैं। जब डॉक्टर ही तैयार नहीं होंगे, तो अस्पताल में कहां से आएंगे। सरकारी अस्पताल में रेडियोलॉजिस्ट को करीब 1 से 1.25 लाख रुपये वेतन मिलता है।

प्राइवेट केंद्रों में यही डॉक्टर तीन से चार लाख रुपये तक कमा लेता है। इसलिए ज्यादातर डॉक्टर सरकारी नौकरी में आना नहीं चाहते। रेडियोलॉजिस्ट बड़े शहर में ही रहना चाहते हैं। छोटे जिले और गांव के अस्पताल में पोस्टिंग से बचते हैं। नतीजा कई जिलों में एक भी रेडियोलॉजिस्ट नहीं है।

ऐसे होगा प्रशिक्षण
छह महीने में रोज प्रैक्टिकल होगा। सीनियर डॉक्टर की देखरेख में जांच करनी होगी। आखिर में परीक्षा होगी। जो पास होगा, उसी को जांच की अनुमति मिलेगी।

स्त्री रोग विशेषज्ञ और रेडियोलॉजिस्ट की देखरेख में होगी ट्रेनिंग
स्वास्थ्य विभाग ने एमबीबीएस डॉक्टरों का प्रशिक्षण स्त्री रोग विशेषज्ञ और रेडियोलाजिस्ट की देखरेख में कराने का निर्देश दिया है। प्रशिक्षण के दौरान थ्योरी और प्रैक्टिकल, दोनों तरह की कक्षाएं होंगी। विभाग ने प्रशिक्षण के लिए निदेशक प्रमुख के नेतृत्व में एक टीम का गठन किया है। टीम इसपर नजर रखेगी कि डॉक्टर प्रशिक्षण ले रहें या नहीं। टीम में अपर निदेशक, बिहार स्वास्थ्य विज्ञान विवि के कुलपति, निदेशक, स्वास्थ्य शिक्षा, विभागाध्यक्ष रेडियोलॉजी एनएमसीएच, विभागाध्यक्ष स्त्री व प्रसूती रोग पीएमसीएच, राज्य कार्यक्रम पदाधिकारी और विवि के परीक्षा नियंत्रक शामिल हैं। विभाग ने निर्देश दिया है कि जो डॉक्टर तीन प्रयासों में भी दक्षता-मूल्यांकन परीक्षा (सीबीए) पास नहीं किए हैं, वह भी छह महीने का प्रशिक्षण ले सकेंगे। प्रशिक्षण के बाद डॉक्टरों को प्रमाण पत्र मिलेगा।

कई एमबीबीएस डॉक्टरों के केंद्रों का रुका है नवीनीकरण
सरकार से निर्देश आने से पहले तक अभी कई एमबीबीएस डॉक्टरों के अल्ट्रासाउंड केंद्रों का नवीनीकरण जिला स्वास्थ्य विभाग ने रोका है। विभाग ने इस मसले पर मुख्यालय से मार्गदर्शन मांगा है। मार्गदर्शन मिलने के बाद ही विभाग इन केंद्रों का नवीनीकरण करेगा। इससे पहले जिला स्वास्थ्य विभाग की तरफ से मासिक रिपोर्ट नहीं देने वाले अल्ट्रासाउंड केंद्रों को नोटिस भी किया था।

कौन-कौन सी जाचें कर सकेंगे
– प्रशिक्षण वाले डॉक्टर सिर्फ पेट और पेल्विक का सामान्य अल्ट्रासाउंड करेंगे।

– कैंसर, जटिल गर्भावस्था या भ्रूण की बारीक जांच जैसे मुश्किल केस वे नहीं देखेंगे। ऐसे केस रेडियोलॉजिस्ट को भेजे जाएंगे।

– पीसीपीएनडीटी कानून का सख्ती से पालन करना होगा होगा। हर जांच का रिकार्ड, फार्म-एफ और ऑनलाइन एंट्री जरूरी होगी। नियम टूटा तो अनुमति रद्द होगी और कार्रवाई भी होगी।

    इसमें शासकीय डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिया जाएगा ताकि रेडियोलॉजिस्ट की कमी को पूरा करने में मदद मिले। वे मरीजों की बेसिक जांच कर सकेंगे। हाई रिस्क के लिए अनुभवी रेडियालॉजिस्ट के पास भेजा जाएगा।– डॉ. प्रज्ञा तिवारी, वरिष्ठ संयुक्त संचालक, विनियमन एवं नीति, लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा,मप्र।