UP: उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के बाराबंकी (Barabanki) और प्रतापगढ़ (Pratapgarh) जिलों से जुड़ा एक चौंकाने वाला मामला अदालत के फैसले के बाद सामने आया है। नरौली गांव, सतरिख थाना क्षेत्र के निवासी जयप्रकाश सिंह ने कथित तौर पर एक ही शैक्षिक प्रमाणपत्र और दस्तावेजों का उपयोग कर दो अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी हासिल कर ली थी। आरोप है कि उन्होंने फर्जी दस्तावेजों की मदद से शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग में नियुक्ति पाई और वर्षों तक दोनों जगहों से वेतन और भत्ते लेते रहे।
दो विभागों में अलग-अलग पदों पर नियुक्ति
जांच में पता चला कि जयप्रकाश सिंह की पहली नियुक्ति 26 दिसंबर 1979 को प्रतापगढ़ जिले के स्वास्थ्य विभाग में नॉन-मेडिकल असिस्टेंट के रूप में हुई थी। इसके बाद जून 1993 में उन्होंने बाराबंकी जिले के बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षक पद पर भी नौकरी प्राप्त कर ली। हैरानी की बात यह रही कि दोनों नियुक्तियों में लगभग एक जैसे दस्तावेजों का उपयोग किया गया और लंबे समय तक वे दोनों विभागों में कर्मचारी के रूप में दर्ज रहे।
करीब 17 साल तक चलता रहा दोहरी नौकरी का मामला
सरकारी नियमों के अनुसार कोई भी व्यक्ति एक समय में केवल एक ही सरकारी पद पर कार्य कर सकता है। इसके बावजूद जयप्रकाश सिंह लगभग 17 वर्षों तक दोनों जिलों में सरकारी कर्मचारी बने रहे। इस दौरान उन्हें दोनों विभागों से नियमित रूप से वेतन और अन्य भत्ते मिलते रहे। यह सवाल भी उठता रहा कि इतने लंबे समय तक यह मामला अधिकारियों की नजर से कैसे छिपा रहा।
आरटीआई से सामने आया पूरा मामला
20 फरवरी 2009 को आवास विकास कॉलोनी निवासी प्रभात सिंह ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद सूचना का अधिकार (आरटीआई) के माध्यम से दोनों विभागों से जानकारी मांगी गई। रिकॉर्ड की जांच में यह स्पष्ट हुआ कि जयप्रकाश सिंह एक ही समय में प्रतापगढ़ के स्वास्थ्य विभाग और बाराबंकी के शिक्षा विभाग में कार्यरत थे और दोनों जगह से वेतन ले रहे थे। जांच के बाद उनके खिलाफ धोखाधड़ी और कूटरचना के आरोपों में एफआईआर दर्ज की गई।
अदालत का फैसला और सजा
लंबी सुनवाई के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुधा सिंह की अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया। अदालत ने जयप्रकाश सिंह को सात वर्ष के कठोर कारावास और 30 हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। साथ ही सरकारी खजाने से प्राप्त किए गए वेतन की वसूली का भी आदेश दिया गया। अभियोजन अधिकारी अनार सिंह के अनुसार, मामले की जांच और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने यह फैसला सुनाया, जिसने सरकारी व्यवस्था में निगरानी की कमी पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
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