आजमगढ़ में सुभासपा की ‘सामाजिक समरसता महारैली’ 22 फरवरी को, ब्राह्मण कार्ड और शंकराचार्य विवाद के बीच सियासत तेज

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) 22 फरवरी को आजमगढ़ में ‘सामाजिक समरसता महारैली’ आयोजित करने जा रही है। यह महारैली आजमगढ़ के जनता इंटर कॉलेज मैदान, अहिरौला में होगी। पार्टी का दावा है कि रैली में समाज के सभी वर्गों की भागीदारी होगी और विशेष रूप से 10 हजार से अधिक प्रबुद्ध ब्राह्मणों की मौजूदगी रहेगी।

सपा के गढ़ में शक्ति प्रदर्शन

राजनीतिक रूप से यह रैली बेहद अहम मानी जा रही है, क्योंकि आजमगढ़ को लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत गढ़ माना जाता है। ऐसे में एनडीए में शामिल सुभासपा द्वारा यहां बड़े स्तर पर महारैली करना सपा के लिए चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि यदि ब्राह्मण समाज की बड़ी भागीदारी होती है तो इसका सीधा राजनीतिक संदेश निकलेगा।

ब्राह्मण मुद्दा और माघ मेले का विवाद

इस महारैली को हाल ही में माघ मेले के दौरान हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद से भी जोड़कर देखा जा रहा है। माघ मेले में ब्राह्मणों के साथ अभद्रता और चोटी पकड़कर मारपीट का मामला सुर्खियों में रहा। इस घटना पर प्रदेश की राजनीति गरमा गई थी।

वहीं, उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने लखनऊ स्थित अपने आवास पर 101 बटुक ब्राह्मणों को आमंत्रित कर पूजा-अर्चना की। उन्होंने एक कार्यक्रम में सार्वजनिक रूप से कहा था कि “चोटी पकड़ना गलत है यह महाअपराध है, महापाप लगेगा।” उनके इस कदम को ब्राह्मण समाज की नाराजगी शांत करने की कोशिश के रूप में देखा गया।

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दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद से खेद व्यक्त करते हुए सम्मान की बात कही थी और संत समाज के प्रति आदर दोहराया था।

सीएम योगी का सख्त रुख

इस पूरे विवाद पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में कहा कि कोई भी व्यक्ति खुद को शंकराचार्य लिख लेने से शंकराचार्य नहीं बन जाता। उन्होंने कहा कि “मेरे लिए, मंत्री के लिए, शंकराचार्य के लिए—सबके लिए राष्ट्र पहले है।” सीएम ने कानून और व्यवस्था को सर्वोपरि बताते हुए स्पष्ट किया कि कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं है।

राजनीतिक संदेश क्या?

आजमगढ़ में होने वाली सुभासपा की यह महारैली केवल सामाजिक समरसता का कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। ब्राह्मण समाज की सक्रिय भागीदारी का संदेश देकर पार्टी क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश कर रही है।

अब 22 फरवरी को होने वाली इस महारैली पर सबकी नजरें टिकी हैं। देखना होगा कि यह शक्ति प्रदर्शन पूर्वांचल की राजनीति में क्या नया संदेश देता है और सपा के गढ़ में कितना असर छोड़ता है। और ब्राह्मणों के शामिल होने पर क्या यूपी की राजनीति में कोई नया रूप देखने को मिलेगा

INPUT-ANANYA MISHRA

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