सुप्रीम कोर्ट ने 24 फरवरी यानी बिते दिन एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ‘नोटा’ के प्रभाव पर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या विधानसभा और आम चुनावों में ‘नोटा’ के विकल्प ने ‘निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता’ में सुधार किया है? चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने स्पष्ट किया कि ‘नोटा’ यानी उपरोक्त में से कोई नहीं, का विकल्प अपने आप में कोई इकाई नहीं बन सकता क्योंकि अधिकतम वोट मिलने के बावजूद वह किसी रिक्त सीट को नहीं भर सकता। सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में नोटा विकल्प के प्रभाव को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि इससे देश में चुने गए प्रतिनिधियों की गुणवत्ता में कोई सुधार हुआ है या नहीं। अदालत ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें मांग की गई है कि नोटा का विकल्प हर चुनाव में अनिवार्य किया जाए, यहां तक कि उन सीटों पर भी जहां केवल एक ही उम्मीदवार मैदान में हो।
सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के एक प्रावधान को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें यह तर्क दिया गया था कि यह प्रावधान मतदाताओं को एकल उम्मीदवार की स्थिति में नोटा विकल्प चुनने से रोकता है।याचिका में मांग की गई थी कि सभी चुनावों में, जिनमें एकल उम्मीदवार वाले चुनाव भी शामिल हैं, नोटा विकल्प को अनिवार्य बनाया जाए। आपको बता दे नोटा को 2013 में पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत सरकार मामले में ऐतिहासिक फैसले में दिए गए निर्देश के मद्देनजर लागू किया गया था।मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने मौखिक टिप्पणियों में कहा कि भारत में पढ़े-लिखे और संपन्न वर्ग की तुलना में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की मतदान भागीदारी ज्यादा रहती है। जस्टिस बागची ने कहा, क्या नोटा से निर्वाचित नेताओं की गुणवत्ता बेहतर हुई है? आंकड़े बताते हैं कि शिक्षित और संपन्न लोग कम वोट डालते हैं, जबकि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग ज्यादा मतदान करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने बिते दिन संक्षिप्त सुनवाई के दौरान, जस्टिस बागची ने कहा कि नोटा एक व्यवस्था नहीं बन सकती क्योंकि अधिकतम वोट मिलने के बावजूद यह एक भी सीट नहीं भर सकती। पीठ ने यह भी कहा कि अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित करने के लिए चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।पीठ ने इस बढ़ती प्रवृत्ति पर भी खेद व्यक्त किया कि शिक्षित और संपन्न मतदाता, अशिक्षित और महिलाओं की तुलना में चुनावों में बहुत कम मतदान करते हैं। पीठ ने यह भी कहा कि चुनावों में मतदान को अनिवार्य बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए ताकि अच्छे उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित हो सके। अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमानी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा, “हम बहुत सारे काल्पनिक आधारों पर विचार कर रहे हैं। इस तरह कानून की परीक्षा नहीं ली जा सकती। मतदान का अधिकार सांविधानिक अधिकार है। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने अब इस याचिका पर सुनवाई के लिए 17 मार्च की तारीख तय की है।
अब जीस नोटा को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है आखिर वो है क्या इसे विस्तार से समझिए दरअसल नोटा का मतलब होता है उपरोक्त में से कोई नहीं जब मतदाता मतदान करने जाता है तो अपने मनपंसद उम्मीदवार के लिए वोट करता और उसकी चुनाव चिन्ह वाला बटन दबा कर अपने मत का प्रयोग करता है,लेकिन मतदाता को कोई भी उम्मीदवार पंसद नहीं है तो वो नोटा का बटन दबा कर अपने मत का प्रयोग कर सकता है इसका मतलब ये हुआ की वो किसी को भी अपना वोट नहीं दे रहा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी EVM के जरिए मतदान के दौरान वोटर्स को NOTA का विकल्प मिलता है जो सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने की सुविधा देता है। साथ ही उनके वोट की गोपनीयता को बनाए रखता है। तकनीकी रूप से यह चुनाव परिणाम को प्रभावित नहीं करता है। मतलब यह हुआ कि यदि NOTA को किसी भी उम्मीदवार से ज्यादा वोट मिलते हैं तब भी सबसे ज्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार जीत जाता है। लेकिन यह नागरिकों को यह शक्ति देता है कि वे चुनावी प्रक्रिया से दूर रहे बिना अपने असंतोष को जाहिर कर सकें।
INPUT-ANANYA MISHRA









































