गरुड़ पुराण (Garuda Purana) हिंदू धर्म के 18 महापुराणों में से एक है, जिसमें भगवान विष्णु और गरुड़ के संवाद के माध्यम से जीवन, मृत्यु, कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष जैसे गहन विषयों का वर्णन है। यह ग्रंथ मुख्य रूप से वैष्णव संप्रदाय से जुड़ा है और मृत्यु के बाद की प्रक्रियाओं, श्राद्ध-तर्पण तथा आत्मा की यात्रा पर विशेष प्रकाश डालता है। पुराण में कर्मों के आधार पर अगले जन्म का निर्धारण बताया गया है, जिसमें बेटियों के जन्म को विशेष सौभाग्य से जोड़ा जाता है।
बेटियों का जन्म, भाग्य नहीं, सौभाग्य और पुण्य का फल
गरुड़ पुराण की एक प्रसिद्ध कथा में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं कि किन कर्मों से किसी घर में पुत्री का जन्म होता है। श्रीकृष्ण जवाब देते हैं कि पुत्र का जन्म भाग्य से होता है, लेकिन पुत्री का जन्म सौभाग्य का प्रतीक है। बेटियां केवल उन माता-पिता के घर जन्म लेती हैं, जिन्होंने पूर्वजन्म में अच्छे कर्म किए हों और पुण्य अर्जित किया हो। ऐसे घरों में लक्ष्मी स्वरूप बेटी का आगमन होता है, जो परिवार को प्रेम, समृद्धि और सौभाग्य प्रदान करती है।
पूर्वजन्म के अच्छे कर्म ही बेटी का कारण
कथा के अनुसार, जो दंपति पूर्वजन्म में धर्म, दान, सेवा और सद्कर्मों में लीन रहते हैं, उन्हें ही बेटी के रूप में ईश्वरीय आशीर्वाद मिलता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि बेटियां सृष्टि का आधार हैं और उनके बिना विश्व अधूरा है। पूर्वजन्म के पुण्य कर्मों से ही माता-पिता को यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि उनके घर लक्ष्मी का अवतरण हो। वहीं, कई बेटियां होने वाले घर तो अत्यंत पुण्यवान माने जाते हैं।
प्राचीन ग्रंथ में लिंग निर्धारण का उल्लेख
गरुड़ पुराण के कुछ अध्यायों (जैसे अध्याय 15) में गर्भधारण और जन्म की प्रक्रिया का वैज्ञानिक ढंग से वर्णन है। यहां बताया गया है कि समागम की रात्रि के आधार पर संतान का लिंग निर्धारित होता है – सम रात्रियों में पुत्र और विषम रात्रियों में पुत्री का जन्म। यह प्राचीन ज्ञान गर्भ में भ्रूण के विकास और कर्मों के प्रभाव को दर्शाता है, लेकिन बेटियों को विशेष पुण्य का फल मानते हुए उनके जन्म को दुर्लभ और शुभ बताया गया है।
आधुनिक संदर्भ में बेटियों का महत्व
आज के समय में बेटियों को लक्ष्मी का रूप माना जाता है और नवरात्रि में कन्या पूजन की परंपरा इसी भावना को दर्शाती है। गरुड़ पुराण का यह रहस्य हमें सिखाता है कि बेटियों का जन्म संयोग नहीं, बल्कि पूर्वजन्म के सद्कर्मों का प्रतिफल है। ऐसे में बेटियों का सम्मान और पालन-पोषण परिवार के लिए सबसे बड़ा पुण्य कार्य है। इस ग्रंथ की शिक्षाएं हमें सदाचार और कर्मों की महिमा याद दिलाती हैं।

















































