इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत सुरक्षा या निजी संपत्ति का हवाला देकर सार्वजनिक व्यवस्था और शांति को खतरे में नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी भी स्थान, चाहे वह निजी ही क्यों न हो पर ऐसी गतिविधियाँ नहीं होनी चाहिएं जिनसे कानून-व्यवस्था प्रभावित हो।
किन जजों की पीठ ने दिया फैसला?
यह आदेश न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुनाया। मामला बरेली निवासी तारिक खान की याचिका से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने रमजान के दौरान निजी संपत्ति पर नमाज पढ़ने से रोक और शांति भंग के आरोप में किए गए चालान को चुनौती दी थी।
प्रशासन का पक्ष और अदालत में पेशी
सुनवाई के दौरान अदालत ने बरेली के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को तलब किया था, जो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। राज्य की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने दलील दी कि याचिकाकर्ता सुरक्षा की आड़ में नियमों का दुरुपयोग कर रहा है। हलफनामे के जरिए अदालत को बताया गया कि संबंधित निजी संपत्ति पर रोजाना 52 से 62 लोग नमाज के लिए इकट्ठा हो रहे थे, जिससे क्षेत्र की सांप्रदायिक शांति पर खतरा पैदा हो रहा था।
कोर्ट की सख्ती और याचिकाकर्ता का आश्वासन
अदालत के कड़े रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील राजेश कुमार गौतम ने भरोसा दिलाया कि भविष्य में उस स्थान पर बड़ी संख्या में लोगों को नमाज के लिए एकत्रित नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने इस आश्वासन को रिकॉर्ड में लेते हुए कहा कि यदि भविष्य में इसका उल्लंघन हुआ और भीड़ जुटाकर शांति भंग की स्थिति बनी, तो प्रशासन सख्त कार्रवाई करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा।
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चालान वापसी और अन्य निर्देश
न्यायालय ने 16 जनवरी 2026 को जारी चालानों को तुरंत वापस लेने का निर्देश दिया और पूर्व में जारी अवमानना नोटिस भी रद्द कर दिए। साथ ही, पहले दी गई सुरक्षा को वापस लेने का आदेश भी दिया गया, जिसमें हसीन खान का नाम शामिल था। इन निर्देशों के साथ अदालत ने याचिका का निस्तारण कर दिया और प्रशासन को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कदम उठाने की छूट दी।
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