क्या है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज, जिसे ईरान ने किया बंद! दुनिया की अर्थव्यवस्था पर मंडराया महाविनाश

मिडिल ईस्ट में एक बड़ा भूचाल आ गया है. ईरान में इजरायल और अमेरिका की ओर से किए गए एक बड़े सैन्य हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली ख़ामेनेई की मौत हो गई. इस घटना के बाद पूरी दुनिया में कोहराम मच गया है. इस समय सभी देशों की निगाहें एक बेहद संकरे समुद्री रास्ते पर टिकी हैं. इस रास्ते का नाम स्ट्रेट ऑफ होर्मुज …हाल ही में आई रिपोर्टों के मुताबिक, ईरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले कमर्शियल जहाज़ों की आवाज़ाही को बंद कर दिया है. हालांकि ईरान की तरफ़ से इस बारे में कोई आधिकारिक बयान अभी तक नहीं आया है।

आज हम इस रास्ते की अहमियत को समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर यह सात समुद्र पार का यह छोटा सा जलमार्ग हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है? दरअसल, यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं है, बल्कि दुनिया भर के तेल व्यापार का बादशाह है. वहाँ की एक छोटी सी हलचल सीधे भारत में आपकी गाड़ी के पेट्रोल-डीज़ल के बिल को तय करती है.भौगोलिक दृष्टि से देखें तो ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ फारस की खाड़ी (Persian Gulf) को हिंद महासागर से जोड़ने वाला गेट है. इसके एक तरफ (उत्तर में) ईरान है, तो दूसरी तरफ (दक्षिण में) ओमान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित हैं. करीब 161 किलोमीटर लंबा यह समुद्री गलियारा अपने सबसे संकरे हिस्से में महज 21 मील (करीब 33 किलोमीटर) चौड़ा रह जाता है. यहां पानी इतना उथला है कि बड़े जहाजों के गुजरने के लिए जो नेविगेशन लेन बनी है, उसकी चौड़ाई सिर्फ दो मील ही है. यही भौगोलिक बनावट इसे दुनिया का सबसे अहम इलाका बनाती है।

इसकी अहमियत का सबसे बड़ा कारण यह है कि खाड़ी देशों के पास अपना तेल दुनिया तक पहुंचाने का इसके अलावा कोई दूसरा समुद्री विकल्प नहीं है. आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में समुद्र के रास्ते होने वाले कच्चे तेल के व्यापार का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले इसी रास्ते से होकर गुजरता है सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूएई जैसे बड़े ओपेक देशों का तेल एशियाई बाजारों तक इसी रूट से पहुंचता है. इसके अलावा कतर की पूरी LNG सप्लाई भी इसी पर निर्भर है. हर रोज 2 करोड़ बैरल से ज्यादा कच्चा तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद यहां से गुजरते हैं. यही वजह है कि इसे ग्लोबल एनर्जी ट्रेड का ‘किंगमेकर’ या ‘बादशाह’ कहा जाता है।

जब भी खाड़ी देशों, खासकर ईरान और पश्चिमी देशों (अमेरिका-इजराइल) के बीच तनातनी होती है, तो होर्मुज स्ट्रेट एक बड़े भू-राजनीतिक हथियार में बदल जाता है. इस संकरे रास्ते पर ईरान की भौगोलिक पकड़ बहुत मजबूत है. इतना ही नहीं ईरान के पास करीब 3000 शॉर्ट-रेंज मिसाइलें हैं, जो 200 से 250 किलोमीटर तक मार कर सकती हैं।तनाव के समय, सिर्फ हमले के डर से ही इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों का वॉर-रिस्क इंश्योरेंस और मालभाड़ा (फ्रेट चार्ज) आसमान छूने लगता है. लंबी अवधि के लिए इसे पूरी तरह बंद करना मुश्किल है क्योंकि इससे ईरान का अपना व्यापार भी ठप हो जाएगा, लेकिन जहाजों को दी जाने वाली चेतावनियां और नेवल माइंस का खतरा ही दुनिया भर की सप्लाई चेन को धीमा करने और तेल की कीमतों में आग लगाने के लिए काफी होता है।

अब इन सब के बीच होर्मुज का बंद होना भारत के लिए कितना खतरनाक है तो बता दे भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. इसमें से करीब 50% , यानी रोजाना 25 से 27 लाख बैरल तेल, इसी होर्मुज स्ट्रेट से होकर भारत के तटों तक पहुंचता है. अगर इस रास्ते पर कोई भी रुकावट आती है, तो भारत को तुरंत अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे दामों पर तेल खरीदना पड़ेगा….हालांकि, भारत के पास आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए सामरिक पेट्रोलियम भंडार यानी SPR मौजूद हैं।

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इसके अलावा हम 40 से ज्यादा देशों से रूस, अमेरिका के साथ-साथ 40 देश है जिनसे तेल खरीदते हैं. लेकिन मुश्किल यह है कि खाड़ी देशों से तेल भारत आने में सिर्फ 5-7 दिन लगते हैं, जबकि अटलांटिक क्षेत्र या रूस से इसे पहुंचने में 25 से 45 दिन का समय लग जाता है. यानी होर्मुज के रास्ते में पैदा हुई कोई भी अड़चन सीधे तौर पर भारत का आयात बिल बढ़ाएगी, जिससे देश में महंगाई और आपकी जेब पर दबाव बढ़ना तय है…. वहीं इस वक्त ईरान पर जो संकट इस वक्त आया है इन सब के बीच अब सवाल उठने शुरू हो गए है की ईरान या अमेरिका, किसके साथ अरब अरब देश? बता सऊदी अरब, UAE और बहरीन जैसे देशों पर ईरानी हमले हो रहे हैं। ये वर्षों से अमेरीकी सुरक्षा पर निर्भर रहे हैं इसीलिए अभी भी ये देश अमेरिकी खेमे में ही रहेगे। ईरान के साथ इनकी दुश्मनी भी पुरानी ही रही है। इन्होंने ईरान को कमजोर करने में अमेरिका की मदद ही की है। सऊदी ने डोनाल्ड ट्रंप से ईरान पर हमला करने की लॉबिंग की थी। इसीलिए अब जब ईरान इन देशों पर हमला कर रहा है तो ये देश तबाही की आशंका से डर गये हैं। ये अब अमेरिका के साथ खड़े हैं।

दूसरी तरफ अगर बाद दक्षिण एशिया की करें तो पाकिस्तान ने अमेरिकी हमले के बाद ईरान के ‘आत्मरक्षा के अधिकार’ का समर्थन किया है। लेकिन पाकिस्तान अमेरिका के साथ खड़ा है। पाकिस्तान के आर्मी चीफ डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ जाने का दुस्साहस नहीं कर सकते हैं। कई एक्सपर्ट्स का ये भी कहना है कि पाकिस्तान ने अचानक अफगानिस्तान से लड़ाई इसलिए शुरू कर दी है क्योंकि वो ईरान की लड़ाई से बचने की कोशिश कर रहा है। पाकिस्तान को डर है कि ट्रंप उसे ईरान के खिलाफ लड़ने के लिए कह सकते हैं। वहीं भारत को लेकर ये तय है कि वो किसी भी खेमे का हिस्सा ना पहले था और ना अभी रहा है। भारत सिर्फ शांति और कूटनीति पर ही बात करेगा।

INPUT-ANANYA MISHRA

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