उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुर्मी और लोध समाज के बीच तनाव अब खुले रूप में सामने आ गया है। महोबा जिले के चरखारी विधायक बृजभूषण सिंह राजपूत (लोध समाज) और जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह (कुर्मी समाज) के बीच 30 जनवरी को हुए विवाद ने यह संघर्ष शुरू किया। मंत्री के कार्यक्रम में पहुंचे विधायक ने ग्राम प्रधानों और समर्थकों के साथ मिलकर काफिले को रोक दिया और जल जीवन मिशन में लापरवाही, पाइपलाइन के बाद सड़कों की मरम्मत न होने और योजना की खराब स्थिति का आरोप लगाया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला व्यक्तिगत विवाद से निकलकर दोनों ओबीसी जातियों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में बदल गया। दोनों समाज भाजपा के मजबूत वोटबैंक हैं, जिससे पार्टी के लिए यह बड़ा राजनीतिक संकट बन गया है।
लखनऊ में लोध महासभा की बैठक ने दी नई ताकत
लखनऊ के विश्वेश्वरैया भवन में लोध महासभा का बड़ा सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, प्रदेश के पशुधन मंत्री धर्मपाल सिंह, बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह और कई लोध विधायक-नेता मंच पर मौजूद रहे। इस बैठक को चरखारी विधायक बृजभूषण राजपूत के समर्थन और लोध समाज की एकजुटता के रूप में देखा जा रहा है। सम्मेलन में लोध समाज ने अपनी संगठनात्मक ताकत दिखाई और पार्टी में हिस्सेदारी बढ़ाने की मांग को जोर-शोर से उठाया। यह बैठक महोबा विवाद के ठीक बाद हुई, जिससे इसे जलशक्ति मंत्री स्वतंत्रदेव सिंह के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन माना जा रहा है। लोध समाज के नेताओं ने कहा कि उनकी आवाज को दबाया नहीं जा सकता और जनता की समस्याओं को उठाना उनका हक है।
भाजपा के लिए जातीय संतुलन का बड़ा संकट
भाजपा में कुर्मी और लोध दोनों जातियां बहुत महत्वपूर्ण हैं। कुर्मी समाज से स्वतंत्रदेव सिंह जैसे प्रभावशाली मंत्री हैं, जबकि लोध समाज से केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा, धर्मपाल सिंह, सांसद साक्षी महराज, मुकेश राजपूत जैसे कई दिग्गज नेता हैं। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के समय से लोध वोट बैंक भाजपा के साथ मजबूती से जुड़ा रहा है। महोबा घटना के बाद दोनों समाजों में नाराजगी और बयानबाजी बढ़ गई। विधायक बृजभूषण को पार्टी से स्पष्टीकरण नोटिस मिला, लेकिन लोध समाज ने इसे जनता की आवाज बताया। लखनऊ की बैठक ने यह संदेश दिया है कि लोध समाज अपनी मांगों पर अड़ेगा और संगठित रूप से आगे बढ़ेगा। पार्टी के लिए अब कुर्मी-लोध संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है।
2027 चुनाव से पहले गंभीर खतरा
2027 विधानसभा चुनाव से पहले यह जातीय टकराव भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में कुर्मी-लोध वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अगर यह विवाद और गहराया तो विपक्षी दल इसे भुनाने की कोशिश जरूर करेंगे। पार्टी नेतृत्व इस मामले को अनुशासन और संवाद के जरिए सुलझाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन लोध महासभा की बैठक ने साफ संकेत दिए हैं कि समाज अपनी बात मनवाने के लिए तैयार है। आने वाले दिनों में भाजपा को दोनों समाजों के बीच संतुलन बनाने के लिए बड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं, जैसे कोई बड़ा प्रतिनिधित्व या आश्वासन देना। फिलहाल यह विवाद यूपी की सियासत में कुर्मी-लोध फैक्टर को और तेजी से गरमा रहा है।
विपक्ष की नजर और राजनीतिक प्रभाव
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल इस विवाद को भाजपा के अंदर असंतोष और जातीय विभाजन के रूप में पेश कर रहे हैं। विपक्ष का कहना है कि भाजपा जो एकजुटता का दावा करती है, वह अब टूटती नजर आ रही है। बुंदेलखंड और अन्य क्षेत्रों में जहां दोनों जातियां निर्णायक हैं, वहां यह टकराव वोटों पर सीधा असर डाल सकता है। भाजपा के रणनीतिकार अब इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाने की कोशिश में जुटे हैं, लेकिन लोध महासभा की बैठक ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। यह देखना होगा कि आने वाले दिनों में यह टेंशन कैसे कम होती है या और गहराती है।
INPUT-ANANYA MISHRA

















































