UP: उत्तर प्रदेश के संभल जिले में नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद (हरिहर मंदिर) सर्वे के दौरान हुई हिंसा के मामले में तत्कालीन सीओ (अब डीएसपी) अनुज चौधरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने संभल के चंदौसी सीजेएम कोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें अनुज चौधरी समेत लगभग 22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 5 सप्ताह बाद तय की है। इस दौरान सीजेएम के आदेश पर रोक बनी रहेगी।
हाईकोर्ट में सुनवाई का विवरण
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकल पीठ ने की। अनुज चौधरी और उत्तर प्रदेश सरकार ने अलग-अलग याचिकाओं के जरिए सीजेएम के 9 जनवरी 2026 के आदेश को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से अपर महाधिवक्ता मनीष गोयल ने दलील दी कि सीजेएम ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 175(4) के अनिवार्य प्रावधानों की अनदेखी की है। उन्होंने कहा कि लोक सेवकों (पुलिस अधिकारियों) के खिलाफ कार्रवाई से पहले वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट मंगाना और स्पष्टीकरण लेना जरूरी है, लेकिन सीजेएम ने ऐसा नहीं किया।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फिलहाल एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा कि इस बीच कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी और मामले की सुनवाई 5 सप्ताह बाद होगी। इस फैसले से अनुज चौधरी और अन्य पुलिसकर्मियों को अस्थायी राहत मिल गई है।
पृष्ठभूमि और सीजेएम का आदेश
संभल हिंसा नवंबर 2024 में हुई थी, जिसमें सर्वे के दौरान बवाल हुआ, कई लोग घायल हुए और कुछ मौतें भी हुईं। घायल मोहम्मद आलम के पिता यामीन ने सीजेएम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि पुलिस ने गोलीबारी की और उनके बेटे को गोली लगी। सीजेएम विभांशु सुधीर ने बीएनएसएस की धारा 175(3) के तहत अनुज चौधरी (तत्कालीन सीओ), इंस्पेक्टर अनुज तोमर समेत 20-22 पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था। इस आदेश के बाद पुलिस ने इसका पालन नहीं किया और हाईकोर्ट में चुनौती दी।
राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव
यह मामला संभल हिंसा के बाद पुलिस कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाता रहा है। सीजेएम के आदेश के बाद विभांशु सुधीर का तबादला भी हुआ था, जिस पर अधिवक्ताओं ने विरोध जताया था। हाईकोर्ट का यह फैसला पुलिस अधिकारियों को संरक्षण देने की दिशा में देखा जा रहा है, जबकि याचिकाकर्ता पक्ष इसे लोक सेवकों की जवाबदेही पर असर डालने वाला बता रहा है। 5 सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में दोनों पक्ष अपनी दलीलें मजबूती से रखेंगे। तब तक एफआईआर दर्ज नहीं होगी।

















































