वाराणसी: चंद्रमा पर भविष्य में मानव बस्ती बसाने और वहीं उपलब्ध संसाधनों से निर्माण कार्य करने की संभावनाओं को मजबूत करने की दिशा में आईआईटी (बीएचयू) के वैज्ञानिकों ने अहम उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के शोधकर्ताओं ने चंद्रमा की सतह जैसी विशेषताओं वाली कृत्रिम लूनर मिट्टी (Lunar Soil Simulant) विकसित की है। इसके साथ ही इस मिट्टी से धातु निकालने और 3डी प्रिंटिंग तकनीक के माध्यम से निर्माण सामग्री तैयार करने पर भी अनुसंधान शुरू कर दिया गया है।
विशेषज्ञों की टीम कर रही बहुआयामी शोध
यह महत्वाकांक्षी परियोजना आईआईटी (बीएचयू) के मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रो. कमलेश कुमार सिंह के नेतृत्व में संचालित हो रही है। शोध कार्य में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. पवन शर्मा, केमिकल इंजीनियरिंग विभाग की डॉ. उदिता घोष और इसरो के वैज्ञानिक डॉ. अंकुश कुमार भी अपनी विशेषज्ञता दे रहे हैं। इसके अलावा शोधार्थी रचिता सिंह और अभिषेक सिंह भी इस परियोजना में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।
चंद्र अभियानों की लागत घटाने में मिलेगी मदद
संस्थान के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने बताया कि यह शोध भारत के भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। उनका कहना है कि यदि चंद्रमा पर उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग वहीं निर्माण कार्यों में किया जाए तो पृथ्वी से भारी-भरकम निर्माण सामग्री भेजने की आवश्यकता काफी कम हो जाएगी। इससे अंतरिक्ष मिशनों का खर्च घटेगा और लंबी अवधि के चंद्र अभियानों को अधिक व्यवहारिक बनाया जा सकेगा।
रेगोलिथ के गुणों पर आधारित है नई तकनीक
वैज्ञानिकों के अनुसार चंद्रमा की सतह पर रेगोलिथ नामक महीन धूल और चट्टानी परत मौजूद होती है, जिसमें कई प्रकार के खनिज और धात्विक तत्व पाए जाते हैं। इन्हीं गुणों का अध्ययन करते हुए शोधकर्ताओं ने विशेष रासायनिक मिश्रण की मदद से कृत्रिम लूनर मिट्टी तैयार की है। वर्तमान में इसकी संरचना, मजबूती और अन्य भौतिक गुणों का विस्तृत परीक्षण किया जा रहा है।
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3डी प्रिंटिंग से बन सकेंगे आश्रय स्थल और लैंडिंग पैड
शोध का अगला चरण इस कृत्रिम मिट्टी का उपयोग 3डी प्रिंटिंग तकनीक में करना है। वैज्ञानिकों का लक्ष्य ऐसी निर्माण सामग्री विकसित करना है, जिससे भविष्य में चंद्रमा पर मानव आवास, लैंडिंग पैड, सड़कें और अन्य जरूरी ढांचे सीधे वहीं तैयार किए जा सकें। यह तकनीक भारत के आगामी चंद्र अभियानों और अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।



