एक तरफ परमाणु शक्ति… दूसरी तरफ रोटी का संकट! क्या पाकिस्तान एक बार फिर खाद्यान्न संकट की ओर बढ़ रहा है? क्या आने वाले दिनों में पाकिस्तान के करोड़ों लोगों के लिए सबसे जरूरी चीज़-आटा-भी मुश्किल से मिलने वाली है? रावलपिंडी और इस्लामाबाद में आटे की सप्लाई प्रभावित है, फ्लोर मिलें चेतावनी दे रही हैं, बाजार में घबराहट है और कीमतें बढ़ने लगी हैं। क्या यह सिर्फ कुछ शहरों का संकट है या पूरे पाकिस्तान में फैलने वाला खाद्य संकट?
पाकिस्तान के रावलपिंडी और इस्लामाबाद क्षेत्र में पंजाब फूड डिपार्टमेंट द्वारा गेहूं की आपूर्ति रोके जाने के बाद दर्जनों फ्लोर मिलों ने उत्पादन प्रभावित होने की चेतावनी दी है। मिल मालिकों का कहना है कि उनके पास सीमित स्टॉक बचा है। अगर जल्द आपूर्ति बहाल नहीं हुई तो बाजार में आटे की उपलब्धता तेजी से घट सकती है। आटे की कीमतों में कितनी बढ़ोतरी हुई? यही सबसे बड़ा सवाल है।
स्थानीय बाजारों में 20 किलो आटे के बैग की कीमत कुछ क्षेत्रों में लगभग 2,800 से 3,000 पाकिस्तानी रुपये तक पहुंचने की खबरें हैं, जबकि कुछ सप्ताह पहले यही बैग लगभग 2,300–2,500 रुपये के आसपास बिक रहा था। यानी कई इलाकों में 15 से 25 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। संकट गहराने पर इसमें और तेजी आने की आशंका जताई जा रही है।
आखिर संकट की वजह क्या है? इसके पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। पहला कारण गेहूं की आपूर्ति में रुकावट। फ्लोर मिलों को पर्याप्त गेहूं नहीं मिल रहा। दूसरा कारण पाकिस्तान की कमजोर अर्थव्यवस्था। विदेशी मुद्रा संकट, ऊंची महंगाई और वित्तीय दबाव पहले से मौजूद हैं। तीसरा कारण सरकारी नीति पर सवाल। 2024 में पाकिस्तान में गेहूं आयात को लेकर बड़ा विवाद हुआ था। आरोप लगे कि जरूरत से ज्यादा गेहूं आयात करने से किसानों को नुकसान हुआ, सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ा और खाद्य प्रबंधन पर सवाल खड़े हुए।
अब सवाल उठता है कि क्या यह संकट पूरे पाकिस्तान में फैल सकता है? यही सबसे बड़ी चिंता है। अगर गेहूं की आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई तो अन्य शहरों में भी आटे की कमी हो सकती है। कीमतों में और तेजी आ सकती है। जमाखोरी बढ़ सकती है। गरीब और निम्न आय वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ेगा। पाकिस्तान फ्लोर मिल्स एसोसिएशन ने भी चेतावनी दी है कि अगर सप्लाई बहाल नहीं हुई तो संकट व्यापक रूप ले सकता है।
क्या पाकिस्तान पहले भी ऐसे संकट से गुजरा है? बिल्कुल। 2019-20 में भी पाकिस्तान में आटे का बड़ा संकट आया था। उस समय एक किलो आटे की कीमत लगभग 50 रुपये से बढ़कर करीब 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई थी। कई शहरों में लंबी कतारें लगी थीं और सरकार को आपात कदम उठाने पड़े थे। यानी आज का संकट कोई अलग घटना नहीं, बल्कि खाद्य प्रबंधन की पुरानी समस्याओं की याद दिलाता है।
इसका सबसे बड़ा असर गरीब परिवारों पर पड़ेगा। क्योंकि पाकिस्तान में करोड़ों लोग रोज़मर्रा के भोजन के लिए रोटी पर निर्भर हैं। जब आटा महंगा होता है घर का बजट बिगड़ता है। कुपोषण का खतरा बढ़ता है। महंगाई और तेज महसूस होती है। सरकार के खिलाफ नाराज़गी बढ़ती है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सरकार क्या कह रही है? सरकार का दावा है कि देश में गेहूं की कोई वास्तविक कमी नहीं है और पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।
सरकार का कहना है कि जमाखोरी और कृत्रिम संकट पैदा करने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। लेकिन फ्लोर मिल उद्योग का कहना है कि यदि तुरंत गेहूं उपलब्ध नहीं कराया गया तो उत्पादन प्रभावित होगा और बाजार में संकट और गहरा जाएगा। यह सिर्फ पाकिस्तान की कहानी नहीं है। यह बताती है कि खाद्य सुरक्षा केवल खेतों में उत्पादन से नहीं आती। मजबूत खरीद नीति, भंडारण, परिवहन, वितरण और समय पर सरकारी फैसले भी उतने ही जरूरी हैं। वरना गेहूं गोदामों में हो सकता है, लेकिन लोगों की थाली तक नहीं पहुंच पाएगा।
तो सवाल यही है, क्या पाकिस्तान इस संकट से जल्दी बाहर निकल पाएगा? क्या आटे की कीमतें और बढ़ेंगी? क्या यह केवल रावलपिंडी-इस्लामाबाद तक सीमित रहेगा या पूरे देश में फैल जाएगा?




















































