दिल्ली (Delhi) और दिल्ली-एनसीआर (Delhi NCR) के आसमान में इन दिनों धुंधली परत देखी जा रही है, जो आम सर्दियों के स्मॉग से अलग है। मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि इस परत में ज्वालामुखी की राख के कण भी शामिल हैं। दरअसल, 24-25 नवंबर 2025 को अफ्रीकी देश इथियोपिया में अचानक एक 12 हजार साल पुराने हेली गुब्बी ज्वालामुखी का विस्फोट हुआ। इस विस्फोट से निकलने वाली राख 14 किलोमीटर तक ऊपर उठ गई और हवा की धाराओं के जरिए भारत की ओर बढ़ रही है।
ज्वालामुखी की राख में क्या है मौजूद?
ज्वालामुखी की राख में सल्फर डाइऑक्साइड गैस और सूक्ष्म खनिज कण पाए जाते हैं। यह सामान्य राख की तरह मुलायम नहीं होती, बल्कि इसमें सख्त चट्टान, मिनरल्स और ज्वालामुखीय ग्लास के तेज धार वाले कण शामिल होते हैं। कई बार इसमें क्रिस्टलाइन सिलिका भी होती है, जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक हो सकती है।
हेली गुब्बी के अचानक फटने का कारण
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, जब धरती की परतों के नीचे मैग्मा चैंबर में दबाव बढ़ता है, तो चट्टानें दरकने लगती हैं। यदि लावा को कोई कमजोर सतह मिल जाए, तो वह ऊपर की ओर रास्ता बनाता है और बड़ा विस्फोट हो सकता है। टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है,प्लेटों की टक्कर या अलगाव से बनने वाली दरारें दबाव के लिए मार्ग बनाती हैं। हेली गुब्बी में भी दबाव अचानक सतह की ओर धक्का मारता हुआ ऊपर उठा और भारी मात्रा में राख को हवा में उछाल गया. हजारों साल की शांति ने सतह को कमजोर कर दिया था, और यही कमजोरी विस्फोट का प्रमुख कारण बनी।
सक्रिय बनाम सुसुप्त ज्वालामुखी
दुनिया में ज्वालामुखी दो प्रकार के होते हैं,सक्रिय और सुसुप्त।सक्रिय ज्वालामुखी समय-समय पर लावा, धुआं या गैसें छोड़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते हैं इसके विपरीत, सुसुप्त ज्वालामुखी लंबे समय तक शांत रहते हैं, मानो वे गहरी नींद में हों। हेली गुब्बी भी एक सुसुप्त ज्वालामुखी था, जो लगभग 12,000 वर्षों से शांत पड़ा था।
दिल्ली पर असर कितना?
मौसम विशेषज्ञों के मुताबिक, दिल्ली-एनसीआर में जो धुंधली परत दिखाई दे रही है उसमें राख के कण शामिल हैं, लेकिन यह ऊपरी वायुमंडल में तैर रही है। इसलिए जमीनी स्तर पर मोटी राख की परत या भारी गिरावट की संभावना कम है। हालांकि, हवा की गुणवत्ता और दृश्यता पर असर दिखाई दे सकता है।
सेहत पर संभावित असर
वैज्ञानिकों के अनुसार, ज्वालामुखी की राख से आंखों, त्वचा और श्वसन तंत्र को नुकसान हो सकता है। इसके संपर्क में आने पर खांसी, गले में जलन, आंखों का लाल होना, सिरदर्द या थकान जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं। खासकर अस्थमा या ब्रोंकाइटिस जैसी समस्या वाले लोग अधिक प्रभावित हो सकते हैं।
सुरक्षा के उपाय
विशेषज्ञों ने लोगों को सावधानी बरतने की सलाह दी है:
- घर के अंदर अधिक समय बिताएं और खिड़कियां-दरवाजे बंद रखें।
- बाहर निकलना आवश्यक हो तो NIOSH-प्रमाणित N95 मास्क पहनें।
- एयर कंडीशनर के कुछ मोड्स बाहर की हवा अंदर खींचते हैं, उनका इस्तेमाल फिलहाल टालें।
विशेषज्ञों के मुताबिक, राख की ऊपरी परत मौसम पर असर डाल सकती है और रात का तापमान थोड़ा बढ़ा सकती है। हिमालय जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सल्फर डाइऑक्साइड का असर ज्यादा खतरनाक हो सकता है।
















































