गर्दन दर्द को हल्के में न लें! ये 6 लक्षण हो सकते हैं खतरनाक

सर्वाइकल स्पॉन्डायलोसिस, जिसे आम भाषा में गर्दन का गठिया या डीजेनरेटिव डिस्क डिजीज कहा जाता है, धीरे-धीरे विकसित होने वाली समस्या है। यह मुख्य रूप से गर्दन की हड्डियों, डिस्क और जोड़ों में उम्र बढ़ने के साथ होने वाले बदलावों के कारण होती है। पहले यह बीमारी ज्यादातर 40 साल से ऊपर के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन आजकल गलत जीवनशैली, लंबे समय तक कंप्यूटर या मोबाइल का इस्तेमाल और गलत बैठने की आदतों के कारण यह युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है।

इसके पीछे की वजहें

सर्वाइकल स्पॉन्डायलोसिस का मुख्य कारण गर्दन की हड्डियों और डिस्क का घिसना और उनकी लचीलापन में कमी है। उम्र बढ़ने के अलावा कई फैक्टर्स इसके खतरे को बढ़ा सकते हैं, जैसे लंबे समय तक गलत पॉस्चर में रहना, चोट या ट्रॉमा, बार-बार भारी सामान उठाना, परिवार में बीमारी का इतिहास, और स्मोकिंग या अनहेल्दी आदतें। ये सभी कारण गर्दन की हड्डियों और नसों पर दबाव बढ़ाकर समस्या को और गंभीर बना सकते हैं।

Also Read: तेजी से घटेगा वजन! डाइट में जोड़ें ये फूड्स, फायदा देखकर हैरान रह जाएंगे

लक्षण जो नजरअंदाज नहीं करने चाहिए

सर्वाइकल स्पॉन्डायलोसिस के लक्षण अक्सर धीरे-धीरे दिखते हैं। इसमें गर्दन में दर्द और अकड़न, सिर घुमाने पर खिंचाव, सिरदर्द, कंधों और हाथों में सुन्नपन या झुनझुनी, मांसपेशियों की कमजोरी और कभी-कभी चक्कर या बैलेंस की समस्या शामिल हैं। अगर स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव ज्यादा हो जाए, तो चलने में कठिनाई या मूत्र/मल नियंत्रण की समस्या जैसी गंभीर परेशानियां भी हो सकती हैं।

बचाव और जीवनशैली में बदलाव

इस बीमारी से बचाव या इसके असर को कम करने के लिए सही जीवनशैली अपनाना जरूरी है। सही पॉस्चर बनाए रखना, हर 30-40 मिनट में हल्की स्ट्रेचिंग करना, मोबाइल का सीमित इस्तेमाल, गर्दन और पीठ की मांसपेशियों को मजबूत करना, सही तकिया चुनना, स्मोकिंग छोड़ना और वजन नियंत्रित रखना इससे मददगार हो सकता है। नियमित योग और एक्सरसाइज भी गर्दन की लचीलापन और रक्त प्रवाह सुधारने में सहायक हैं।

Also Read : इम्युनिटी बढ़ाने और वजन घटाने में कारगर है ये ड्रिंक, जानें कैसे करें इस्तेमाल

इलाज और चिकित्सीय उपाय

सर्वाइकल स्पॉन्डायलोसिस का इलाज कई तरीकों से किया जा सकता है। शुरुआती स्टेज में दवा जैसे पेन रिलीवर, मसल रिलैक्सेंट्स, स्टेरॉयड इंजेक्शन और फिजियोथेरेपी प्रभावी साबित होती है। गंभीर मामलों में ट्रैक्शन, योग, आयुर्वेदिक थेरेपी या एक्यूपंक्चर की मदद ली जा सकती है। जब नसों या स्पाइनल कॉर्ड पर अत्यधिक दबाव हो, तो सर्जरी जैसे डिस्क हटाना, फ्यूजन या आर्टिफिशियल डिस्क लगाना आवश्यक हो सकता है। शुरुआती लक्षणों की अनदेखी न करना और समय पर डॉक्टर से जांच कराना सबसे महत्वपूर्ण कदम है।

( देश और दुनिया की खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं.)