पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच घोषित युद्ध विराम के बाद भारत ने इसे सकारात्मक कदम के रूप में स्वागत किया है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कदम क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। बयान में यह भी उल्लेख किया गया कि भारत हमेशा से संघर्ष को कम करने, संवाद और कूटनीति के माध्यम से समस्याओं के समाधान का समर्थन करता रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे जहाजों को बचाने की पहल
भारत ने युद्ध विराम की घोषणा के तुरंत बाद ईरान से संपर्क किया है ताकि होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे अपने तेल और गैस के जहाजों को सुरक्षित तरीके से बाहर निकाला जा सके। इस समय लगभग 16 भारतीय जहाज इस क्षेत्र में फंसे हुए हैं, जिनमें कुल दो लाख टन से अधिक एलपीजी है, जो देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए बेहद आवश्यक है।
ऊर्जा सुरक्षा में राहत की संभावना
सरकारी सूत्रों ने बताया कि युद्ध विराम की घोषणा के बाद भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पैदा हुई चिंताएँ कम होने की संभावना है। भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें पश्चिम एशिया का योगदान लगभग 60 प्रतिशत है। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी अस्थिरता से न केवल ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित होती, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा दबाव पड़ता।
विदेश सचिव की अमेरिका यात्रा और उच्च स्तरीय बैठक
इस बीच, भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी 8-11 अप्रैल तक अमेरिका दौरे पर हैं। वे इस दौरान अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से पश्चिम एशिया की स्थिति पर चर्चा करेंगे। भारत की विदेश नीति के अनुसार, इस तरह की बैठकें क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव
विशेषज्ञों का अनुमान है कि युद्ध विराम के बाद व्यापारिक जहाजों की आवाजाही सामान्य होगी और वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता लौटेगी। इससे भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों को राहत मिलेगी और एलपीजी व तेल की आपूर्ति सुचारू रूप से बहाल हो सकेगी। भारत लगातार क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को अपनी प्राथमिकता मानता आया है।
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