मानसा
मानसा में नशे के खिलाफ आवाज उठाने वाले एक्टिविस्ट परविंदर सिंह झोटा की हत्या के 16 दिन बाद भी उनके शव का पोस्टमॉर्टम नहीं हो पाया है। उनका शव मानसा के सिविल अस्पताल की मॉर्च्युरी में माइनस 3 डिग्री सेल्सियस तापमान पर फ्रीजर में रखा हुआ है।
इस फ्रीजर की टेंपरेचर मॉनिटरिंग के लिए एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति हुई है। वह हर 2 घंटे में फ्रीजर का टेंपरेचर चेक करता है। इसके अलावा, बिजली जाने पर भी फ्रीजर चालू रहे, इसलिए बड़ी बैटरियों का इंतजाम किया गया है।
परिवार की सहमति न मिलने के कारण झोटा के शव की पोस्टमॉर्टम की प्रक्रिया अटकी हुई है। जांच अपने हाथ में लेने के दूसरे दिन ही CBI ने शव को पोस्टमॉर्टम के लिए PGI ले जाने की व्यवस्था करने के संबंध में सिविल अस्पताल के SMO को पत्र लिखा था।
अस्पताल प्रबंधन ने शव को रेफर करने की प्रक्रिया भी पूरी कर दी थी, लेकिन परिवार के इनकार के कारण आगे की कार्रवाई नहीं हो सकी। अब पोस्टमॉर्टम में हो रही देरी से CBI की जांच रिपोर्ट तैयार करने में भी मुश्किलें आने की आशंका जताई जा रही है।
CBI ने समझाने का प्रयास किया, सहमति नहीं बनी
13 अक्टूबर को हुए परविंदर झोटा हत्या के 7 दिन बाद ही केंद्र सरकार ने मामले की जांच CBI को सौंप दी थी। जिसके बाद 20 अक्टूबर की रात करीब 12 बजे CBI की एक टीम ने मानसा पहुंचकर जांच शुरू कर दी थी। जिसके बाद CBI की टीम ने परिवार से संपर्क कर शव का पोस्टमॉर्टम पीजीआई में करवाने के लिए सहमति देने का प्रयास किया था।
टीम ने परिवार को समझाया था कि पोस्टमॉर्टम के बाद शव में केमिकल इंजेक्ट कर उसे दोबारा सुरक्षित रखा जा सकता है। हालांकि, मृतक की पत्नी और पिता ने कमेटी के सदस्यों व अन्य लोगों से बातचीत करने के बाद पोस्टमॉर्टम करवाने से इनकार कर दिया। इसके चलते शव का पोस्टमॉर्टम अब तक नहीं हो सका है।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के बिना जांच में आ सकती है दिक्कत
पुलिस के अनुसार, किसी हत्या के मामले में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसमें मौत के कारण, शरीर पर चोटों की प्रकृति और अन्य चिकित्सकीय पहलुओं से जुड़ी जानकारी दर्ज की जाती है। जांच एजेंसी इन तथ्यों को केस से जुड़े अन्य साक्ष्यों के साथ मिलाकर जांच की दिशा तय करती है।
झोटा हत्याकांड में भी पोस्टमॉर्टम न होने के कारण CBI को जांच के इस महत्वपूर्ण हिस्से को पूरा करने में परेशानी आ सकती है। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट मिलने के बाद ही जांच एजेंसी उसे अपने रिकॉर्ड में शामिल कर अन्य साक्ष्यों के साथ उसका मिलान कर सकेगी। हालांकि, जांच पर वास्तविक असर कितना पड़ेगा, यह मामले के अन्य साक्ष्यों और जांच की प्रगति पर निर्भर करेगा।
CBI के पत्र के बाद SMO ने पूरी की रेफर की प्रक्रिया
बताया जा रहा है कि CBI ने जांच अपने हाथ में लेने के दूसरे दिन यानी 21 अक्टूबर को ही मानसा सिविल अस्पताल के SMO को पत्र लिखकर शव को पोस्टमॉर्टम के लिए PGI ले जाने के लिए वाहन का प्रबंध करने को कहा था। पत्र मिलने के बाद SMO डॉ. गुरमेल सिंह ने शव को ले जाने के लिए वाहन की व्यवस्था करने के साथ उसे रेफर करने की प्रक्रिया भी पूरी कर दी थी।
इसके बावजूद परिवार की सहमति न बनने से शव को पोस्टमॉर्टम के लिए PGI नहीं भेजा जा सका। ऐसे में अब तक शव सिविल अस्पताल की मॉर्च्युरी में ही रखा हुआ है।
हर दो घंटे बाद जांचा जा रहा फ्रीजर का तापमान
मॉर्च्युरी में लंबे समय से शव रखे होने के कारण अस्पताल प्रबंधन उसकी सुरक्षा और उचित तापमान बनाए रखने पर नजर रख रहा है। सूत्रों के मुताबिक, SMO ने शव की देखभाल के लिए मॉर्च्युरी में एक नोडल अधिकारी नियुक्त किया है। फ्रीजर का तापमान हर दो घंटे बाद चेक किया जाता है, ताकि शव को निर्धारित ठंडे वातावरण में रखा जा सके।
बिजली गुल होने की स्थिति में फ्रीजर का तापमान बनाए रखने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने अलग से बड़ी बैटरियों का बैकअप भी रखा है। इसका उद्देश्य बिजली आपूर्ति बाधित होने पर फ्रीजर को चालू रखने और शव को सुरक्षित रखने की व्यवस्था बनाए रखना है।
लंबे समय तक शव रखने से नमूनों की जांच प्रभावित होने की आशंका
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक डॉक्टर के अनुसार, शव को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के बावजूद समय बीतने के साथ शरीर में जैविक बदलाव होते रहते हैं। शरीर के प्रोटीन का टूटना और ऊतकों में होने वाले बदलाव पोस्टमॉर्टम के दौरान कुछ निष्कर्षों को प्रभावित कर सकते हैं।
हालांकि, फ्रीजर में लगातार उचित तापमान बनाए रखने से इन बदलावों की गति कम हो सकती है। ऐसे में झोटा के शव का पोस्टमॉर्टम जितनी देर से होगा, जांच के लिए जरूरी चिकित्सकीय निष्कर्षों को दर्ज करने में उतनी ही सावधानी की जरूरत पड़ सकती है।
फिलहाल, पोस्टमॉर्टम को लेकर परिवार की सहमति न बनने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई है। CBI की जांच में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की भूमिका और इस प्रक्रिया में होने वाली देरी का वास्तविक प्रभाव आगे की जांच के दौरान स्पष्ट होगा।














