‘पायजामे का नाड़ा खींचना रेप की कोशिश’, सुप्रीम कोर्ट ने बदला HC का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित फैसले को बदल दिया है इसके साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट को फटकार भी लगाई है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पायजामे का नाड़ा खोलना बलात्कार की कोशिश की है।सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस विवादित फैसले को पलटने का फैसला किया है, जिसमें कहा गया था कि एक बच्ची के ब्रेस्ट को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा खोलना और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर कड़ी टिप्पणी करते हुए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने जस्टिस जॉयमाल्या बागची और एनवी अंजारिया के साथ कहा कि यौन अपराधों के मामलों में फैसले के लिए कानूनी तर्क और सहानुभूति दोनों की जरूरत होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी लड़की के पायजामे का नाड़ा खींचना और ब्रेस्ट पकड़ना रेप की कोशिश माना जाएगा। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें इसे रेप की कोशिश की जगह रेप की तैयारी बताया गया था। चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कानून के स्थापित सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया है।

कोर्ट ने क्या कहा

हम हाईकोर्ट की इस बात से सहमत नहीं हैं कि आरोप केवल तैयारी तक सीमित हैं। आरोपियों की हरकत साफ तौर पर रेप की कोशिश की ओर इशारा करती है। पहली नजर में शिकायतकर्ता और अभियोजन ने रेप की कोशिश का मामला बना दिया है।

HC के फैसले को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने प्रोटेक्शन ऑफ़ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस (POCSO) एक्ट के तहत दो आरोपियों के खिलाफ रेप की कोशिश के असली कड़े चार्ज को बहाल कर दिया कोर्ट ने कहा, “जो फैक्ट्स बताए गए हैं, उन्हें देखते हुए, हम हाई कोर्ट के इस नतीजे से सहमत नहीं हो सकते कि आरोप सिर्फ रेप के अपराध को करने की तैयारी के हैं। “आरोपियों द्वारा की गई कोशिश साफ तौर पर और जरूरी तौर पर हमें इस नतीजे पर ले जाती है कि पहली नज़र में, शिकायत करने वाले और प्रॉसिक्यूशन ने रेप करने की कोशिश के प्रोविज़न को लागू करने का मामला बनाया है. इसलिए क्रिमिनल ज्यूरिस्प्रूडेंस के तय सिद्धांतों के साफ़ तौर पर गलत इस्तेमाल के कारण, विवादित फैसले को रद्द किया जाता है।

पूरा मामला क्या था

कासगंज की एक महिला ने 12 जनवरी, 2022 को कोर्ट में एक शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप लगाया कि 10 नवंबर, 2021 को वह अपनी 14 साल की बेटी के साथ कासगंज के पटियाली में देवरानी के घर गई थी। उसी दिन शाम को अपने घर लौट रही थी। रास्ते में गांव के रहने वाले पवन, आकाश और अशोक मिल गए। पवन ने बेटी को अपनी बाइक पर बैठाकर घर छोड़ने की बात कही। मां ने उस पर भरोसा करते हुए बाइक पर बैठा दिया, लेकिन रास्ते में पवन और आकाश ने लड़की के प्राइवेट पार्ट को पकड़ लिया। आकाश ने उसे पुलिया के नीचे खींचने का प्रयास करते हुए उसके पायजामे की डोरी तोड़ दी।

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लड़की की चीख-पुकार सुनकर ट्रैक्टर से गुजर रहे सतीश और भूरे मौके पर पहुंचे। इस पर आरोपियों ने देसी तमंचा दिखाकर दोनों को धमकाया और फरार हो गए। पीड़ित की मां की शिकायत पर आरोपी पवन और आकाश के खिलाफ IPC की धारा 376, 354, 354B और POCSO एक्ट की धारा 18 के तहत केस दर्ज किया गया। वहीं आरोपी अशोक पर IPC की धारा 504 और 506 के तहत केस दर्ज किया। आरोपियों ने समन आदेश से इनकार करते हुए हाईकोर्ट के सामने रिव्यू पिटीशन दायर की। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की सिंगल बेंच ने क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली थी।

17 मार्च, 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने कहा- किसी लड़की के निजी अंग पकड़ लेना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ देना और जबरन उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश से रेप या ‘अटेम्प्ट टू रेप’ का मामला नहीं बनता। यह रेप की तैयारी है। उन्होंने फैसला सुनाते हुए 2 आरोपियों पर लगी धाराएं बदल दीं। वहीं 3 आरोपियों के खिलाफ दायर क्रिमिनल रिवीजन पिटीशन स्वीकार कर ली। हाईकोर्ट ने आरोपी आकाश और पवन पर IPC की धारा 376 (बलात्कार) और POCSO अधिनियम की धारा 18 के तहत लगे आरोपों को घटा दिया। उन पर धारा 354(बी) (कपड़े उतारने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का प्रयोग) और POCSO अधिनियम की धारा 9/10 (गंभीर यौन हमला) के तहत मुकदमा चलाने का आदेश दिया। साथ ही निचली अदालत को नए सिरे से समन जारी करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लिया और फैसले पर रोक लगाई

हाईकोर्ट के फैसले पर कानूनी विशेषज्ञों, राजनेताओं और अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने विरोध जताया था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वतः संज्ञान लिया। 25 मार्च, 2025 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी गई। तत्कालीन CJI बी.आर. गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने इस केस पर सुनवाई की थी। बेंच ने कहा, “हाईकोर्ट के आदेश में की गई कुछ टिप्पणियां पूरी तरह असंवेदनशील और अमानवीय नजरिया दिखाती हैं।” सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और अन्य पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।

INPUT-ANANYA MISHRA 

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