UGC Rules पर पूर्वांचल में बवाल! BJP का कोर वोटर क्यों भड़क गया?

मैं अवनीश विद्यार्थी, गोरखपुर में Ground Zero पर UGC के नए नियमों को लेकर चर्चा के लिए पहुँचा। आज जो विषय मैं आपके सामने रख रहा हूँ, वह किसी सुनी‑सुनाई बात पर आधारित नहीं है, बल्कि बीते कुछ दिनों में पूर्वांचल के अपने प्रवास के दौरान जो मैंने प्रत्यक्ष रूप से देखा, सुना और महसूस किया है, उसी अनुभव से उपजा हुआ है।

पिछले दो–तीन दिनों से मैं लगातार पूर्वांचल के अलग‑अलग जिलों में भ्रमण कर रहा हूँ। गोरखपुर, देवरिया, कुशीनगर, मऊ का इलाका, आज़मगढ़, अंबेडकर नगर, इन तमाम क्षेत्रों से गुजरते हुए मैंने लोगों से संवाद किया है। इस दौरान एक बात बेहद स्पष्ट होकर सामने आई है। अभी मैं यह तय नहीं कर रहा हूँ कि यह चर्चा आगे किस दिशा में जाएगी या इसका राजनीतिक निष्कर्ष क्या होगा, लेकिन UGC से जुड़े नए नियमों और सुधारों को लेकर ज़मीन पर जो सवाल उठ रहे हैं, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

जहाँ‑जहाँ भी मैं गया, गाँवों में, कस्बों में, चौपालों पर, छोटे‑छोटे वार्डों में, लोग एक ही सवाल बार‑बार पूछ रहे हैं। यह निर्णय अचानक क्यों लिया गया? इसकी आवश्यकता क्या थी? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या यह फैसला हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए ख़तरा बन सकता है? सरकार की मंशा क्या थी, अदालत की भूमिका क्या रही और UGC ने यह नियम किस सोच के तहत बनाया, इन तमाम सवालों के जवाब लोग ढूँढ रहे हैं।

मैं कई पारिवारिक आयोजनों में गया, शोक सभाओं में शामिल हुआ, सामाजिक बैठकों में बैठा और ग्रामीण इलाकों में लोगों से खुलकर बातचीत की। हर जगह यही बात सामने आई कि यह मुद्दा अब केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। यह ज़मीन पर उतर चुका है। मैंने रात के साढ़े ग्यारह बजे यह रिकॉर्डिंग की। अगर मैं इस समय यह रिकॉर्डिंग कर रहा हूँ तो आप इस विषय की गंभीरता का अंदाज़ा लगा सकते हैं।

सोशल मीडिया पर भी अलग‑अलग तरह के नैरेटिव चल रहे हैं। कोई कह रहा है कि जब बात अपने ऊपर आई, तब लोग बोलने लगे। कोई तीखी और आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल कर रहा है। इसी बीच कुछ राजनीतिक प्रवक्ताओं और नेताओं के बयान भी सामने आए हैं, जो आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। एक पत्रकार के रूप में मैं यह कहना चाहता हूँ कि चाहे कोई सत्ता पक्ष में हो या विपक्ष में, शब्दों की ज़िम्मेदारी सबकी बराबर होती है।

एक घटना का भी ज़िक्र ज़रूरी है, जहाँ एक सिटी मजिस्ट्रेट ने इस्तीफ़ा दिया। कोई इसे व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा कह रहा है, कोई राजनीतिक या धार्मिक कारण जोड़ रहा है। सच जो भी हो, लेकिन यह साफ़ है कि हर व्यक्ति अपने अवसरों को अपने ढंग से देखता है। राजनीति में हो या गैर‑राजनीतिक क्षेत्र में मौकों का उपयोग हर कोई करता है। सवाल यह नहीं कि किसने अवसर भुनाया, सवाल यह है कि उससे समाज में क्या संदेश गया।

मैं चंद्रशेखर आज़ाद को सुन रहा था, उनका कहना था कि यूजीसी का बिल वापस होना किसी की हैसियत में नहीं है। इस बात पर मेरे मन में भी सवाल उठता है, क्या इस बिल के आने से पहले आपने इसकी माँग की थी? आज सोशल मीडिया पर लगातार प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं, ख़ासकर उन लोगों से जो परंपरागत रूप से BJP के समर्थक रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि इस नियम के चलते उनके बच्चों का भविष्य असुरक्षित हो गया है।

लोग यह भी पूछ रहे हैं कि क्या नियम इस तरह नहीं बनाया जा सकता था कि यदि किसी भी समाज के छात्र के साथ भेदभाव हो, तो उस पर कार्रवाई की जाए? एक इक्विटी सेल बने, जिसमें सभी वर्गों के प्रतिनिधि हों। कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अतीत की वही गलती दोहरा रहे हैं, जब कुछ जातियों को अपराधी घोषित कर दिया गया था और उन्हें उस कलंक से मुक्त होने में दशकों लग गए?

मध्यम वर्ग की चिंता आज सबसे ज़्यादा अनदेखी की जा रही है। यही वर्ग सबसे अधिक कर देता है, सामाजिक कल्याण योजनाओं की रीढ़ है, लेकिन जब उसके बच्चों के अधिकारों की बात आती है, तो उसकी आवाज़ दब जाती है। क्या एक सामान्य वर्ग के बच्चे के साथ भेदभाव नहीं हो सकता? क्या भेदभाव केवल जाति देखकर ही होता है?

मैं ऐसे परिवारों के बीच बैठा हूँ जिनकी पीढ़ियाँ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी रही हैं। लेकिन आज वही लोग मानसिक दबाव में हैं। वे कह रहे हैं, ‘बहुत हो चुका।’ सवाल यह है कि जो कोर वोटर था, जो विचारधारा के साथ खड़ा था, वह आज क्यों सवाल पूछ रहा है? और जब वह सवाल पूछ रहा है, तो जवाब देने से क्यों बचा जा रहा है?

निशिकांत दुबे अक्सर अपनी उपलब्धियाँ गिनाते हुए कहते हैं, प्रधानमंत्री ने यह किया, हमारी सरकार ने वह किया। इसी संदर्भ में मैंने उत्तर प्रदेश के विधान परिषद के एक सदस्य से यह सवाल पूछा। उनके जवाब में उन्होंने कहा, ‘मान लीजिए मैं आपको रसगुल्ला खिलाऊँ और फिर पलटकर दो थप्पड़ मार दूँ, तो आपको कैसा लगेगा? मीठा लगेगा?

लेकिन जनता का सवाल इससे कहीं आगे है। अगर आपने हमारे लिए कुछ किया है, तो क्या इसका मतलब यह है कि आप हमारे हितों की अनदेखी कर सकते हैं? और अगर गलत शिकायत करने पर कोई सख़्त सज़ा का प्रावधान नहीं है, तो यह नियम एकतरफ़ा क्यों प्रतीत होता है?

इतिहास गवाह है कि सरकार ने ज़रूरत पड़ने पर क़दम पीछे भी खींचे हैं, चाहे वह फ़ार्म लॉ हों या भूमि अधिग्रहण क़ानून। इसलिए आज ज़रूरत है कि इस नियम पर गंभीर पुनर्विचार हो। स्वयंसेवक संघ के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर चिंता है। कई लोग अपने पारिवारिक जुड़ाव पर पुनर्विचार कर रहे हैं, यह बहुत बड़ा संकेत है।

सबसे गंभीर बात यह है कि यह नियम स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में जाति को फिर से केंद्र में ले आता है। जिन बच्चों ने कभी एक‑दूसरे की जाति नहीं पूछी, वे अब एक‑दूसरे को शक की नज़र से देखेंगे। क्या हम आने वाली पीढ़ी को यही भारत देना चाहते हैं?

पूर्वांचल में जो माहौल मैंने देखा है, वह एक चेतावनी है। छोटे‑छोटे विरोध, समूहों में बैठकर चर्चाएँ, यह सब संकेत हैं कि यह मुद्दा गहराता जा रहा है। अगर यह 2027 तक इसी तरह घर कर गया, तो उत्तर प्रदेश, बंगाल और अन्य राज्यों के चुनावों में इसका असर साफ़ दिखेगा।

यह समय है कि सरकार, विपक्ष और सभी जिम्मेदार पक्ष संयम से काम लें। आग में घी डालने से किसी का भला नहीं होगा। यह सिर्फ़ सत्ता पक्ष के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है। यही वजह है कि यह ग्राउंड रिपोर्ट आपके सामने रखना ज़रूरी था।

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