प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मौनी अमावस्या स्नान के दौरान पालकी रोकने और ‘शंकराचार्य’ पदवी के इस्तेमाल पर नोटिस जारी होने से विवाद भड़क गया है। अब राजनीति में सियासत तेज हो गई है—लखनऊ में कांग्रेस मुख्यालय के बाहर उनके समर्थन में बड़े पोस्टर लगाए गए हैं, जिसमें लिखा है “जो गुरु का अपमान करेगा, नरक में गिरेगा”। सपा और कांग्रेस दोनों ही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पक्ष में उतर आई हैं, जबकि योगी सरकार पर अपमान का आरोप लगा रही हैं। यह विवाद अब सनातन धर्म और राजनीति के बीच टकराव का रूप ले रहा है।
विवाद की शुरुआत
माघ मेला 2026 में मौनी अमावस्या (18 जनवरी के आसपास) के दिन स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती स्नान के लिए पालकी में जा रहे थे। मेला प्रशासन ने VIP स्नान नियमों का हवाला देकर पालकी रोक दी। स्वामी ने पैदल स्नान करने से इनकार कर दिया और धरना शुरू कर दिया। अब 6-7 दिनों से वे धरने पर हैं, और उनकी तबीयत भी बिगड़ गई है। प्रशासन ने दो नोटिस जारी किए—एक पालकी रोकने पर, दूसरा ‘शंकराचार्य’ पदवी के इस्तेमाल पर। नोटिस में सुप्रीम कोर्ट के 2022 के आदेश का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया है कि ज्योतिषपीठ के लिए कोई औपचारिक शंकराचार्य नियुक्त नहीं है। प्रशासन ने मेला क्षेत्र में प्रवेश पर स्थायी बैन की चेतावनी भी दी है।
लखनऊ में पोस्टर वॉर शुरू
लखनऊ में उत्तर प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय के बाहर भारतीय युवा कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष शरद शुक्ला ने बड़े पोस्टर लगवाए। पोस्टर पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का चित्र है और लिखा है—”जो गुरु या वेदाचार्य का अपमान करता है, वो भयानक नरक में गिरता है”। यह सीधे योगी सरकार पर कटाक्ष है, जिसमें कहा गया है कि हिंदुस्तान गुरु का अपमान नहीं सहेगा। कांग्रेस ने इसे सनातन धर्म पर हमला करार दिया और स्वामी के साथ खड़ी होने की बात कही। लखनऊ से सुल्तानपुर तक इसी तरह के पोस्टर लगाए जा रहे हैं।
राजनीतिक हमला तेज
सपा ने भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का खुलकर समर्थन किया है। पार्टी नेताओं ने कहा कि योगी सरकार सनातन परंपराओं का अपमान कर रही है। विपक्षी दल इसे हिंदू भावनाओं से खेलने का मुद्दा बना रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि विवाद अब सनातन को कमजोर करने की साजिश तक पहुंच गया है।
प्रशासन और सरकार की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि कुछ लोग सनातन को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन किसी को परंपरा बाधित करने का हक नहीं। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने शंकराचार्य के चरणों में प्रणाम करते हुए विवाद खत्म करने की अपील की। मेला प्रशासन का कहना है कि नियमों का पालन जरूरी है, और कोई अपमान नहीं हुआ—केवल VIP स्नान प्रतिबंध था, पैदल स्नान की अनुमति थी।
अन्य संतों का रुख
पुरी पीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने विवाद पर बयान दिया है। संत समाज में भी मतभेद हैं—कुछ अपमान की निंदा कर रहे हैं, तो कुछ राजनीति न करने की अपील कर रहे हैं। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि मंदिर-मूर्ति तोड़ने वाला औरंगजेब होता है, और उनका अपमान सहन नहीं होगा।
आगे क्या होगा ?
यह मामला यूपी की राजनीति में हिंदू वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है, खासकर 2027 विधानसभा चुनावों से पहले। कांग्रेस और सपा इसे सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बनाने की कोशिश में जुटे हैं।











































