बलिया: कागजों में शेल्टर होम, फाइलों में पुनर्वास की लंबी-चौड़ी योजनाएं और मंचों से समाज के अंतिम व्यक्ति तक मदद पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे, लेकिन जमीनी हकीकत? जब कोई बेबस सड़क पर दर-बदर भटकता है, तो यही भारी-भरकम सिस्टम आंखें फेरकर किनारे बैठ जाता है।
ताजा मामला बागी बलिया का है, जहां 9 महीने से दर-बदर भटक रहे बिहार के पूर्णिया निवासी बालक मोहम्मद रिहान के मामले में सरकारी अमला हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। थानों और चौकियों के चक्कर काट-काटकर परिजन थक चुके थे, गुमशुदगी के पोस्टर दीवारों पर धूल फांक रहे थे, मगर 500 किलोमीटर दूर भटककर आए इस बेसहारा को सहारा दिया बलिया की इंसानियत ने, किसी सरकारी तंत्र ने नहीं।
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जब रिहान बलिया की गलियों में भटका मिला, तो स्थानीय लोगों ने प्रशासनिक नुमाइंदों को फोन घनघनाए, मगर जवाब में सिर्फ बेरुखी मिली। जब खाकी और बाबू सब पल्ला झाड़ चुके थे, तब लोगों के जेहन में एक ही नाम कौंधा, सागर सिंह राहुल (गंगा सेवा समिति)।
न धर्म देखा, न जात पूछी। सागर सिंह ने रिहान को सीधे अपने घर में पनाह दी। दो दिन और दो रात अपने परिवार के सदस्य की तरह उसे भोजन कराया, देखभाल की और फिर शुरू हुआ सोशल मीडिया तथा निजी संपर्कों का अभियान। बिहार पुलिस और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से तार जोड़े गए। आखिरकार रिहान के घर की पहचान हुई और करीब 500 किमी का सफर तय कर रोती-बिलखती नानी और बुआ जब बलिया पहुंचीं, तो अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से लगाकर उनकी आंखें छलक उठीं।
मगर यह कहानी सिर्फ तालियां बजाने की नहीं, बल्कि सिस्टम के गाल पर तमाचा मारने वाली है। सागर सिंह राहुल का दर्द साफ छलका कि लावारिसों को रखने के लिए उनके पास कोई शेल्टर नहीं है। मजबूरी में अपने ही घर में ताला बंद करके निगरानी करनी पड़ती है ताकि लड़का दोबारा न भाग जाए।
सड़क पर करोड़ों बहाने वाले प्रशासन, बड़े-बड़े ट्रस्टों और उद्योगपतियों से यह सीधा सवाल है, जिले में लावारिसों के लिए एक अदद ढंग का पुनर्वास केंद्र क्यों नहीं है? जो काम अरबों के बजट वाली सरकारी मशीनरी को करना चाहिए, वह काम अकेला सागर सिंह 15-16 लावारिसों को घर पहुंचाकर अपने दम पर कर रहा है। धर्म की राजनीति करने वालों को भी बलिया ने आइना दिखा दिया है कि जब सिस्टम सोता है, तब इंसानियत ही जागती है।



















































