उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील सिंह पटेल (Sunil Singh Patel) गंभीर भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गए हैं। मामला खनिज परिवहन से जुड़े तहबाजारी ठेकों में कथित अनियमितताओं का है, जिसमें करोड़ों रुपये के राजस्व नुकसान का दावा किया जा रहा है। यह प्रकरण अब प्रशासनिक के साथ-साथ राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील बन गया है।
तहबाजारी ठेकों में गड़बड़ी का आरोप
वित्तीय वर्ष 2021-22 और 2022-23 के दौरान खनिज तहबाजारी ठेकों में नियमों की अनदेखी किए जाने के आरोप सामने आए हैं। जांच में सामने आया कि ई-नीलामी पुरानी दर (प्रति वाहन 200 रुपये) के आधार पर कराई गई, जबकि बाद में ठेके का कार्यादेश नई दर (400 रुपये प्रति वाहन) पर जारी किया गया। जांच रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रक्रिया से जिला पंचायत को लगभग 6.21 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ। एक वर्ष में जहां न्यूनतम बोली 4.97 करोड़ रुपये थी, वहीं वास्तविक वसूली सिर्फ 2.58 करोड़ रुपये हो सकी, जिससे करीब 2.38 करोड़ रुपये का सीधा घाटा हुआ।
ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के आरोप
आरोप यह भी हैं कि कुछ ठेकेदारों को जानबूझकर प्राथमिकता दी गई और रसीद वितरण में पक्षपात किया गया। अगस्त 2025 में नाराज ठेकेदारों ने जिला पंचायत परिसर में प्रदर्शन और हंगामा भी किया था, जिससे मामला और तूल पकड़ गया।
महोबा डीएम की रिपोर्ट में गंभीर खुलासे
सदर विधायक प्रकाश द्विवेदी और जिला पंचायत सदस्यों की शिकायत पर पहले बांदा के जिलाधिकारी और बाद में महोबा के डीएम से जांच कराई गई। जून 2025 में प्रस्तुत महोबा डीएम की जांच रिपोर्ट में अध्यक्ष सुनील पटेल और कुछ तत्कालीन अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। 20 बिंदुओं पर हुई जांच में 11, 16 और 17वें बिंदु पर वित्तीय अनियमितताओं की पुष्टि हुई। इसके बाद जुलाई 2025 में शासन ने अध्यक्ष से स्पष्टीकरण मांगा और उनके वित्तीय व प्रशासनिक अधिकार सीज करने की नोटिस भी जारी की।
नियमों के बावजूद अध्यक्ष को राहत?
उत्तर प्रदेश क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत अधिनियम, 1961 की धारा 29 के अनुसार, प्रारंभिक जांच में दोष सिद्ध होने पर अंतिम निर्णय तक अध्यक्ष अपने वित्तीय और प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकता। बावजूद इसके, जनवरी 2026 तक सुनील पटेल अपने पद पर बने हुए हैं। आरोप है कि शासन स्तर पर फाइलें बार-बार आपत्तियां लगाकर वापस की जा रही हैं, जिससे कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है।
फतेहपुर प्रकरण से तुलना
शिकायतकर्ताओं ने इस मामले की तुलना फतेहपुर जिले के सरकंडी गांव से की है, जहां दिसंबर 2025 में ग्राम प्रधान पुष्पा द्विवेदी को प्रधानमंत्री आवास योजना और मनरेगा में 55.46 लाख रुपये के घोटाले के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। उनका कहना है कि छोटे मामलों में त्वरित कार्रवाई होती है, जबकि बड़े घोटालों में प्रभावशाली लोगों को संरक्षण मिलता है। हालांकि उपलब्ध आंकड़ों और रिपोर्ट्स में प्रदेश स्तर पर किसी एक जाति के खिलाफ व्यवस्थित भेदभाव के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं। विशेषज्ञ इसे भाजपा के भीतर की राजनीतिक खींचतान से जोड़कर देख रहे हैं।
शासन के फैसले का इंतजार
जनवरी 2026 तक जिला पंचायत अध्यक्ष सुनील पटेल अपने पद पर बने हुए हैं और शासन स्तर पर अंतिम निर्णय लंबित है। दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप से जिला पंचायत का कामकाज प्रभावित हो रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते धारा 29 का सख्ती से पालन किया गया होता, तो यह विवाद इतना लंबा नहीं खिंचता। अब निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही इस पूरे मामले की सच्चाई सामने आ सकेगी।
वही मामले की गंभीरता को देखते हुए Breaking Tube की टीम ने उत्तर प्रदेश विधानसभा की पंचायती राज समिति के सभापति (Chairman) प्रेम सागर पटेल से उनका पक्ष जानने की कोशिश की। हालांकि, लगातार फोन कॉल किए जाने के बावजूद सभापति की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।











































