वाराणसी (Varanasi) के मणिकर्णिका घाट (Manikarnika Ghat), जिसे हिंदू परंपरा में महाश्मशान माना जाता है, हाल ही में बड़े पुनर्विकास का हिस्सा बना। जनवरी 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मणिकर्णिका घाट से सिंधिया घाट तक कॉरिडोर और सौंदर्यीकरण परियोजना की आधारशिला रखी थी। परियोजना की अनुमानित लागत 17–18 करोड़ है और इसे CSR फंडिंग के माध्यम से विकसित किया जा रहा है। जिसे लेकर अब बड़ा विवाद सामने आ रहा है।

विवाद की शुरुआत

13 जनवरी 2026, घाट पर पुनर्विकास कार्य के दौरान विवाद शुरू हुआ। इस दौरान प्रशासन की निगरानी में बुलडोजर चलाए गए और घाट पर स्थित एक पुरानी मढ़ी (raised platform) को हटाया गया, जिस पर देवी-देवताओं की नक्काशी और अहिल्याबाई होल्कर से जुड़ी आकृतियां बनी हुई थीं। यह कार्रवाई सोशल मीडिया पर वायरल हो गई, जिसमें अहिल्याबाई होल्कर की टूटी हुई संरचनाएं और जमीन पर पड़ी मूर्तियां दिखाई दी। इसके बाद आरोप लगे कि सरकार ने एक प्राचीन मंदिर और अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति को ध्वस्त कर दिया।
स्थानीय और राजनीतिक प्रतिक्रिया

इस घटना के बाद स्थानीय पुजारी, घाट पर अंतिम संस्कार करवाने से जुड़े लोग और कुछ सामाजिक संगठन नाराज हो गए। उनका कहना था कि बिना समुदाय से संवाद किए ऐतिहासिक और आस्था से जुड़ी संरचनाओं को हटाया गया। विपक्षी दल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी ने इसे धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ और विरासत के विनाश का मामला बताया। बयानबाजी तेज होने के साथ ही मामला राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंच गया।
सोशल मीडिया पर फर्जी और AI जनरेटेड कंटेंट

विवाद के चरम पर सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें और वीडियो वायरल हुए। प्रशासन के अनुसार इनमें से कई AI जनरेटेड, एडिटेड या पुराने फुटेज थे, जिन्हें हाल की कार्रवाई से जोड़ा गया। कुछ वीडियो में मूर्तियों को तोड़ते दिखाया गया, जबकि कई तस्वीरें वर्षों पुरानी थीं। इस बीच अहिल्याबाई होल्कर ट्रस्ट और इतिहासकारों ने भी प्रशासन से पूछा कि क्या पुनर्विकास से पहले पर्याप्त सलाह ली गई थी?
मुख्यमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि मणिकर्णिका घाट पर कोई प्राचीन मंदिर या अहिल्याबाई होल्कर की मूर्ति नहीं तोड़ी गई है। वायरल तस्वीरें और वीडियो फर्जी या AI जनरेटेड हैं। जो भी पुरानी नक्काशी या मूर्तियां हटाई गई हैं, उन्हें पुरातत्व विभाग ने सुरक्षित कर लिया है और परियोजना पूरी होने के बाद सम्मानजनक स्थान पर पुनः स्थापित किया जाएगा। मुख्यमंत्री ने इसे ‘विकास विरोधी साजिश’ बताते हुए काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के विरोध की याद दिलाई।
पुलिस कार्रवाई और FIR

विवाद के बीच वाराणसी पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया। अब तक 8 अलग-अलग FIR दर्ज की गई हैं, जिनमें आरोप है कि जानबूझकर फेक न्यूज फैलाकर धार्मिक भावनाएं भड़काई गईं और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ा गया। FIR में AAP सांसद संजय सिंह, बिहार के नेता पप्पू यादव और कांग्रेस नेता जसविंदर कौर जैसे नाम शामिल हैं।
परियोजना की वर्तमान स्थिति

वर्तमान में परियोजना का काम अस्थायी रूप से धीमा कर दिया गया है ताकि तथ्यों की जांच की जा सके। प्रशासन का कहना है कि कोई बड़ा मंदिर नहीं तोड़ा गया और हटाई गई संरचनाएं भीड़ प्रबंधन व सुरक्षा कारणों से थीं। सभी मूर्तियां और ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित हैं। प्रशासन के अनुसार मणिकर्णिका घाट पुनर्विकास परियोजना जून 2026 तक पूरी होने की संभावना है। हालांकि, जांच के निष्कर्ष, राजनीतिक दबाव और जनभावनाएं परियोजना की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं।
कई सवाल उठते हैं

मणिकर्णिका घाट विवाद अब सिर्फ निर्माण कार्य तक सीमित नहीं रहा। यह मामला विकास बनाम विरासत, आस्था बनाम अधोसंरचना (Infrastructure), और फेक न्यूज बनाम राजनीति की बहस में बदल गया है। जहां सरकार इसे काशी के समग्र विकास का हिस्सा बता रही है, वहीं विरोधी इसे धार्मिक स्थलों की संवेदनशीलता की अनदेखी मान रहे हैं।
मणिकर्णिका घाट का ऐतिहासिक महत्व

मणिकर्णिका घाट का निर्माण 1771 में लोकमाता देवी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था और 1791 में इसका जीर्णोद्धार भी उन्हीं के द्वारा किया गया था। मणिकर्णिका घाट काशी के 84 प्रमुख घाटों में से एक है और देवी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा निर्मित पांच घाटों में शामिल है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इसी स्थान पर भगवान विष्णु की मणि गिरी थी, जिससे घाट का नाम पड़ा मणिकर्णिका। वहीं अब घाट की ऐतिहासिक विरासत पर आंच आने की चिंता जताई जा रही है।










































