देशभर के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव समाप्त करने के उद्देश्य से यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने नए नियम जारी किए हैं। ये नियम 15 जनवरी से पूरे देश के सभी उच्च शिक्षा संस्थानों, कॉलेज, यूनिवर्सिटी और डिम्ड यूनिवर्सिटी पर लागू हो गए। UGC का दावा है कि नए नियम जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान या दिव्यांगता के आधार पर भेदभाव को समाप्त करने में मदद करेंगे। नए नियम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और NEP 2020 के ‘इक्विटी और इनक्लूजन’ एजेंडे के अनुरूप बनाए गए हैं।
संस्थानों में अनिवार्य नई व्यवस्था
नए नियमों के अनुसार, हर संस्थान में Equal Opportunity Centre (EOC) बनाना जरूरी होगा, जो SC/ST/OBC, PwD और महिलाओं को सपोर्ट देगा। इसके अलावा Equity Committee गठित होगी, जिसकी अध्यक्षता वाइस चांसलर करेंगे। इस कमिटी में SC/ST/OBC, दिव्यांग और महिलाओं का पर्याप्त प्रतिनिधित्व अनिवार्य किया गया है। 24×7 हेल्पलाइन, Equity Ambassadors और कुछ जगह Equity Squads भी स्थापित होंगे।
भेदभाव पर सख्त कार्रवाई का प्रावधान
नियमों में भेदभाव की परिभाषा बहुत व्यापक है और कोई भी अनुचित व्यवहार स्पष्ट शिकायत का आधार बन सकता है। शिकायत मिलने पर तुरंत जांच की जाएगी और सजा कठोर होगी, जिसमें डिग्री रोकना, कॉलेज से निष्कासन, UGC ग्रांट्स बंद करना या संस्थान की मान्यता रद्द करना शामिल है। ये नियम छात्रों, शिक्षकों और स्टाफ सभी पर लागू होंगे। नए नियम में OBC को भी जातिगत भेदभाव की श्रेणी में शामिल किया गया है।
क्यों हो रहा है विवाद?
हालांकि UGC का दावा है कि नए नियमों का मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में सामाजिक न्याय और समानता को मजबूत करना है, लेकिन जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों के बीच इनका तीखा विरोध सामने आ रहा है। विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों की संरचना संतुलित नहीं है और यह एकतरफा प्रभाव डाल सकती है। आलोचकों के अनुसार, इन नियमों के तहत भेदभाव के मामलों में आरोपी के रूप में अक्सर जनरल कैटेगरी के छात्र या शिक्षक को ही देखा जाएगा, जिससे निष्पक्ष जांच पर सवाल खड़े होते हैं।
कैंपस में डर, गुटबाजी, ब्लैकमेलिंग का खतरा
जनरल कैटेगरी का मानना है कि इससे कैंपस में पूर्वाग्रहपूर्ण माहौल बन सकता है। एक बड़ी आपत्ति यह भी है कि अंतिम नियमों में झूठी या फर्जी शिकायत दर्ज कराने पर किसी तरह की सजा का प्रावधान नहीं रखा गया है, जबकि यह व्यवस्था प्रारंभिक ड्राफ्ट में शामिल थी। इससे नियमों के दुरुपयोग की आशंका जताई जा रही है। विरोध करने वालों का कहना है कि आरोप लगते ही जनरल कैटेगरी के छात्र या शिक्षक के खिलाफ ‘पहले दोषी मान लेने’ जैसा माहौल बन सकता है। इसके परिणामस्वरूप कैंपस में डर, गुटबाजी, ब्लैकमेलिंग और आपसी अविश्वास बढ़ने का खतरा है, जो सीधे तौर पर पढ़ाई, शोध और अकादमिक वातावरण को प्रभावित कर सकता है।
सोशल मीडिया और संगठनों में प्रतिक्रियाएं
सोशल मीडिया पर #UGC_RollBack ट्रेंड कर रहा है। कई जनरल कैटेगरी छात्र इसे “सवर्ण-विरोधी कानून” बताते हुए विरोध जता रहे हैं। राजस्थान में ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और कायस्थ संगठनों ने ‘S-4’ नामक समूह बनाकर नए नियमों के खिलाफ प्रदर्शन किया। आलोचकों का कहना है कि यह अमेरिका के DEI मॉडल जैसा अनुभव हो सकता है, जहां समान उद्देश्य के नियमों से कैंपस में विभाजन बढ़ गया।
( देश और दुनिया की खबरों के लिए हमें फेसबुक पर ज्वॉइन करें, आप हमें ट्विटर पर भी फॉलो कर सकते हैं.)














































