द्वारका शारदा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा- 3 शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में हैं। प्रशासन उनका सर्टिफिकेट मांगने वाला कौन होता है? उसे कोई अधिकार नहीं। प्रशासन ने निर्दोष ब्राह्मणों के साथ जो निर्दयता से मारपीट की, वह बेहद निंदनीय है। सदानंद सरस्वती ने यह बात जबलपुर में नर्मदा जन्मोत्सव कार्यक्रम में कही।
स्वामी सदानंद सरस्वती ने क्या कहा
स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि प्रशासन शंकराचार्य से शंकराचार्य होने का प्रमाण नहीं मांग सकता। शंकराचार्य का शिष्य ही शंकराचार्य होता है। उन्होंने बताया कि उनके गुरु जी ने दो लोगों को ही संन्यास दिया था, जिनमें वे स्वयं और अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती शामिल हैं। इस प्रकार अविमुक्तेश्वरानंद जी शंकराचार्य जी के शिष्य हैं। शृंगेरी के शंकराचार्य जी ने उनका अभिषेक किया है और यह उत्तराधिकार परंपरा से आता है। यह शांकर परंपरा है जिसमें कोई दखलंदाजी नहीं कर सकता।
नकली शंकराचार्य बना रहा प्रशासन
उन्होंने कहा कि प्रशासन का यह काम नहीं है कि शंकराचार्य कौन है या कौन नहीं है। अगर प्रशासन यह काम करने लगेगा तो जितने नकली शंकराचार्य हैं और उन्होंने उन सभी को मेले में स्थान दिया है, वे सब उन्हें निरस्त करना चाहिए। वे कई लोगों को जगद्गुरु की उपाधि दे रहे हैं, शंकराचार्य की उपाधि दे रहे हैं, नकली शंकराचार्य बना रहे हैं। असली शंकराचार्यों का महत्व कम करने के लिए यह सब कर रहे हैं और इन सब पर रोक लगनी चाहिए।
अब तक क्या हुआ, जानिए-
18 जनवरी को मौनी अमावस्या पर अविमुक्तेश्वरानंद पालकी में स्नान करने जा रहे थे। पुलिस ने उन्हें रोककर पैदल जाने को कहा। विरोध पर शिष्यों से धक्का-मुक्की हुई। मारपीट की गई। पुलिस उनकी पालकी खींचकर दूर ले गई। इसके बाद वे शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए।
प्रशासन ने दो नोटिस दिए। पहले में शंकराचार्य की पदवी लिखने पर और दूसरे में मौनी अमावस्या के दिन हंगामा करने पर सवाल पूछे। चेतावनी दी गई कि माघ मेले से बैन किया जा सकता है। अविमुक्तेश्वरानंद ने दोनों नोटिसों का जवाब दिया।
24 जनवरी की रात उनके शिविर में कट्टर सनातनी सेना के 8-10 युवक नारे लगाते पहुंचे और घुसने की कोशिश की। आई लव बुलडोजर बाबा’ और ‘योगी जिंदाबाद’ के नारे लगाए। शिष्यों से धक्का-मुक्की हुई। इस पर अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा- जितना जुल्म होगा, उतनी मजबूती से कदम उठाऊंगा।
तीनो शंकराचार्य का समर्थन’
स्वामी सदानंद सरस्वती ने कहा कि किसी पर व्यक्तिगत आक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। हम सिद्धांत की बात बता रहे हैं कि किसी भी देश का राजा कोई भी हो या प्रशासन में कोई भी हो, वह किसी की भी धार्मिक प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगा सकता। देश का जो संस्कार है, जो संस्कृति है, उसमें राजा परिवर्तन नहीं कर सकता। परंपरा में परिवर्तन नहीं कर सकता। देश का कोई भी राजा हो जाए, उसे यह अधिकार नहीं है। शंकराचार्य का शिष्य ही शंकराचार्य होगा। हां, कोई भी शंकराचार्य न कहलवाए, इसलिए अन्य शंकराचार्यों का समर्थन जरूरी है। अविमुक्तेश्वरानंद को तीनों शंकराचार्यों का समर्थन है।
INPUT-ANANYA MISHRA
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