Home Article OPINION: बेहद खतरनाक हैं PFI के मंसूबे

OPINION: बेहद खतरनाक हैं PFI के मंसूबे

PFI Parvez Ahmed Raees Ahmed

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ सहित अवध व पूरे प्रदेश में, प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) की गतिविधियां अभी भी जारी हैं और यही कारण है कि आतंक निरोधी दस्ते (ATS) ने बड़ी कारर्वाई करते हुए प्रदेश के 20 जिलों में 30 टीमें बनाकर छापेमारी की इस दौरान 70 से अधिक संदिग्धों को हिरासत में लिया गया है जबकि वाराणसी में 50-50 हजार रुपये के दो ईनामी सदस्य परवेज और रईस अहमद को भी पकड़ने में सफलता हासिल की है
लखनऊ में एटीएस ने बख्शी का तालाब के अचरामऊ गांव से सात संदिग्ध लोगों को हिरासत में लिया है और उनसे पूछताछ चल रही है। शामली में 11, गाजियाबाद में 10, वाराणसी में आठ, बिजनौर में पांच, मेरठ में चार, बाराबंकी, आजमगढ़ और मुजफ्फरनगर में तीन-तीन बहराइच, देवरिया और कानपुर में दो-दो तथा सीतापुर, बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, बुलंदशहर, सहारनपुर, मुरादाबाद, रामपुर व अमरोहा में एक -एक सदस्य को हिरासत मे लेकर पूछताछ की जा रही है।

ज्ञातव्य है कि केंद्र सरकार ने 2022 में पीएफआई व उसके सहयेगी आठ संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया है लेकिन फिर भी राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त यह संगठन किसी न किसी प्रकार से प्रदेश में अपना नेटवर्क मजबूत करने के प्रयास में लगा हुआ है, इस बात की पक्की खबर लगने के बाद एटीएस ने ताबड़तोड़ छापामारी कर यह कार्रवाई की है।
पीएफआई ने लखनऊ में अपनी जड़ 11 साल पूर्व जमानी आरम्भ करी थी और कुर्सी रोड पर अपना पहला केंद्र बनाया था।

पीएफआई की गतिविधियों को लेकर खुफिया एजेसिंया उस समय सक्रिय हुयी जब अप्रैल 2018 में इस्लाम को लेकर दिल्ली मे एक अधिवेशन का आयोजन हुआ था और उसमें लखनऊ से करीब 40 बस भरकर पीएफआइ के सदस्य पहुंचे थे। दिसंबर 2018 में सीएए को लेकर लखनऊ में हुई हिंसा में पीएफआइ का नाम प्रमुखता से सामने आया था। पीएफआई ने लखनऊ की बस्तियों को धर्म परिवर्तन के लिए निशाना बना रखा था।कुर्सी रोड से बाराबंकी तक करीब 30 किमी के क्षेत्र में पीएफआई की सक्रियता वर्ष 2012 से 2014 के बीच बढ़ गयी। वर्ष 2018 की सेना की खुफिया इकाई की एक रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय सहित कई एजेंसियों को भेजी गयी थी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2012 से 2018 तक पीएफआई की गतिविधियों का उल्लेख किया गया। इस रिपोर्ट में कुर्सी रोड के बाद पीएफआई के दूसरे अड्डे बख्शी का तालाब को लेकर भी एलर्ट किया गया था।

पीएफआई की नजर उस गैर मुस्लिम आबादी पर रहती है जो सामाजिक,आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े होते हैं। सामाजिक विद्वेष का जहर फैलाकर पीएफआई बच्चों को शिक्षा और कल्याण के नाम पर अपने साथ जोड़ता है फिर उनका ब्रेनवाश करके राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रशिक्षित करता है।

पीएफआई वर्तमान सरकार को जनता के बीच गलत साबित करने के लिये नए नए तरीके अपनाता था। पीएफआई की सोशल मीडिया टीम सरकारी योजनाओं के विषय में जानकारी एकत्र कर सक्रिय सदस्यों के बीच जनमत संग्रह कराती थी। इस बात के कई साक्ष्य उनके मोबाइल फोन में मिले हैं। यू टयूब चैनल पर कुछ मुस्लिम नेताओं को बिठाकर बहस भी कराते थे। उलेमा काउंसिल की मदद से धार्मिक उन्माद फैलाने वाले वीडियो तैयार करते थे। पीएफआई के सदस्य गांव- गांव घूमकर धर्म के प्रति कट्टर युवकों को खोजा कर रहे थे जिनको प्रशिक्षित करने के लिए केरल भेजा जा रहा था और एक नया संगठन बनाने की तैयारी चल रही थी।

मुस्लिमों पर अत्याचार के नाम पर युवाओं को करते थे गुमराह-वाराणसी से गिरफ्तार पीएफआई के सदस्य परवेज अहमद और रईस अहमद मुस्लिम युवाओं को भड़काऊ मैसेज भेज रहे थे। जांच एजेसियां विगत कई दिनों से उनके मोबाइल फोन व सोशल मीडिया एकाउंट पर नजर रख रही थीं। पीएफआई को खाड़ी देशों से बड़े पैमाने पर फंडिंग होने का भी खुलासा हुआ है।

प्रतिबंधों के बावजूद पीएफआई की राष्ट्रविरोधी गतिविधियां लगातार संचालित हो रही हैं तथा यह लोग किसी न किसी बहाने प्रदेश को दहलाने की लगातार साजिश रच रहे हैं। उत्तर प्रदेश में पीएफआई की तरफ से फिर से दंगा भड़काने की साजिश की सूचना भी एनआइए ने ही एटीएस को दी थी। हाथरस कांड की जांच के बाद पुलिस को पीएफआई द्वारा दंगा भड़काने के सबूत मिले थे। इस मामले में ही केरल के पीएफआई सदस्य कमाल केपी को गिरफ्तार किया गया था। कानपुर के बेकमगंज इलाके में भड़की हिसा में भी पीएफआई के सक्रिय सदस्यों की संलिप्तता उजागर हुई थी।

ताजा कार्रवाई के पूर्व भी कई बार पीएफआई के सदस्यों की प्रदेश के अनेक स्थानों से गिरफ्तारियां हो चुकी हैं तथा पूछताछ के दौरान कई खतरनाक खुलासे हो रहे हैं। पीएफआई के सक्रिय सदस्य राजनैतिक दलों में भी शामिल हैं यही कारण है कि जब पीएफआई के खिलाफ कड़े कदम उठाये जाते हैं तब मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले सभी दल पीएफआई के समर्थन में बयानबाजी करने लगते हैं। अभी हाल ही में जो पीएफआई सदस्य पकड़े गये उनमे से कुछ लोगों की संलिप्तता के संकेत समाजवादी पार्टी से मिल रहे हैं जिसकी अभी जांच चल रही है।

( मृत्युंजय दीक्षित, लेखक राजनीतिक जानकार व स्तंभकार हैं.)

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