हिजाब पर हाईकोर्ट की टिप्पणी पर उठे सवाल, धार्मिक आजादी और शिक्षा के अधिकार पर पुनर्विचार की मांग

सहारनपुर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हिजाब को लेकर जिस तरह की टिप्पणी की है, उसे देखते हुए मुझे ऐसा महसूस होता है कि अदालत के सामने हिजाब के धार्मिक और संवैधानिक पहलुओं को जिस मज़बूती और स्पष्टता के साथ रखा जाना चाहिए था, शायद उस तरह की दलीलें पेश नहीं की जा सकीं।

हमें यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि मज़हबे इस्लाम में पर्दा और हिजाब महज कोई सामाजिक परंपरा नहीं, बल्कि मुस्लिम महिलाओं के लिए एक अहम धार्मिक हुक्म है। इसलिए किसी मुस्लिम महिला के लिए हिजाब का मामला केवल पहनावे या पसंद का मामला नहीं, बल्कि उसके मज़हबी अमल और धार्मिक आज़ादी से जुड़ा हुआ विषय है।

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हम हमेशा इस बात की वकालत करते हैं कि मुस्लिम बेटियों को बेहतर तालीम हासिल करनी चाहिए, वे आगे बढ़ें, अपने पैरों पर खड़ी हों और समाज तथा देश की तरक़्क़ी में अपना किरदार अदा करें। लेकिन अगर हम महिलाओं की तालीम और तरक़्क़ी की बात तो करें और दूसरी तरफ़ उन्हें अपनी धार्मिक पहचान और हिजाब पर अमल करने की आज़ादी न दें, तो यह उनके साथ कहीं न कहीं नाइंसाफी होगी।

हमारी बेटियाँ तालीम भी हासिल कर सकती हैं और अपने मज़हबी उसूलों पर भी क़ायम रह सकती हैं। तालीम और हिजाब एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। किसी महिला की क़ाबिलियत, उसकी बुद्धिमत्ता और उसकी मेहनत का पैमाना उसके कपड़े नहीं होने चाहिए।

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हम अदालतों का पूरा एहतराम करते हैं और हमें न्यायपालिका पर भरोसा है। इसी भरोसे के साथ हमारी अपील है कि इस मामले पर दोबारा गंभीरता से ग़ौर किया जाए और मुस्लिम महिलाओं के मज़हबी अधिकारों, उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और उनके शिक्षा के अधिकार- तीनों पहलुओं को सामने रखकर मामले पर पुनर्विचार किया जाए।हमारा मक़सद किसी संस्था या अदालत की तौहीन करना नहीं, बल्कि यह याद दिलाना है कि एक लोकतांत्रिक समाज में हर नागरिक को अपने मज़हब पर अमल करने की आज़ादी मिलनी चाहिए। मुस्लिम महिलाओं को हिजाब के साथ तालीम हासिल करने और आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिए।

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