UP: रामगोविन्द चौधरी का निधन एक राजनीतिक युग का अंत! सड़क से सदन तक बुलंद की कमजोरों की आवाज

UP: बलिया की क्रांतिकारी धरती ने देश और प्रदेश की राजनीति को कई ऐसे चेहरे दिए, जिन्होंने सत्ता से समझौता करने के बजाय जनहित और संघर्ष को प्राथमिकता दी। इन्हीं प्रमुख नेताओं में रामगोविन्द चौधरी का नाम भी शामिल है। 9 जुलाई 1953 को जन्मे रामगोविन्द चौधरी ने अपने राजनीतिक जीवन में वंचित, कमजोर और आम लोगों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। सड़क से लेकर विधानसभा तक उनकी राजनीति संघर्ष और जनसरोकारों के इर्द-गिर्द रही।

छात्र राजनीति से शुरू हुआ राजनीतिक सफर

तीन भाइयों में सबसे बड़े रामगोविन्द चौधरी ने शुरुआती पढ़ाई गांव और सिकंदरपुर से की। इसके बाद उन्होंने सतीश चंद्र कॉलेज में उच्च शिक्षा के लिए दाखिला लिया, लेकिन छात्रों के अधिकारों से जुड़े आंदोलनों में सक्रियता के चलते उन्हें कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया। बाद में उन्होंने श्री मुरली मनोहर टाउन पीजी कॉलेज, बलिया में पढ़ाई जारी रखी। वर्ष 1972 में वे टाउन कॉलेज छात्रसंघ के महामंत्री और 1974 में अध्यक्ष चुने गए। विधायक रहते हुए उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की डिग्री भी हासिल की।

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आपातकाल में जेपी आंदोलन और जेल यात्रा

आपातकाल के दौर में रामगोविन्द चौधरी ने लोकतांत्रिक अधिकारों की बहाली के लिए जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वे जनपद छात्र युवा वाहिनी के सह-संयोजक के रूप में आंदोलन से जुड़े रहे। आंदोलन के दौरान उनकी गिरफ्तारी के लिए इनाम तक घोषित किया गया और बाद में उन्हें टीडी कॉलेज परिसर से गिरफ्तार कर लिया गया। करीब 24 महीने जेल में रहने के बाद जब वे रिहा हुए, उसी दिन बलिया कलेक्ट्रेट में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर लोकसभा चुनाव का नामांकन दाखिल करने पहुंचे थे। रिहाई के बाद उनके साथ पहुंचे छात्रों की भीड़ ने चंद्रशेखर का ध्यान खींचा और यहीं से दोनों के बीच राजनीतिक और व्यक्तिगत संबंधों की शुरुआत हुई।

विधानसभा से मंत्री पद तक का सफर

वर्ष 1977 में रामगोविन्द चौधरी जनता पार्टी के टिकट पर चिलकहर विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उन्होंने लगातार पांच बार क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 1991 में मुलायम सिंह यादव की सरकार में उन्हें खाद्य प्रसंस्करण एवं उद्यान विभाग की जिम्मेदारी मिली। वर्ष 2002 में उन्होंने बच्चा पाठक को हराकर दोबारा विधानसभा चुनाव जीता और 2004 में बाल विकास एवं पुष्टाहार मंत्री बनाए गए। 2007 में महज 264 वोटों से चुनाव हारने के बाद उन्होंने 2012 में वापसी की और बेसिक शिक्षा, पंचायती राज तथा समाज कल्याण जैसे महत्वपूर्ण विभाग संभाले।

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नेता प्रतिपक्ष तक पहुंचा राजनीतिक सफर

वर्ष 2017 में रामगोविन्द चौधरी ने बांसडीह विधानसभा सीट से जीत दर्ज की और उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी संभाली। उनका लंबा राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण रहा कि चुनावी जीत-हार और सत्ता के पद स्थायी नहीं होते। छात्र राजनीति से शुरू होकर विधानसभा और मंत्री पद तक पहुंचे रामगोविन्द चौधरी ने अपनी राजनीति में जनहित, संघर्ष और समाजवादी विचारधारा को केंद्र में रखा। यही वजह है कि बलिया की राजनीति में उनका नाम लंबे समय तक संघर्षशील जननेता के रूप में याद किया जाता है।

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