जानलेवा खुलासा : बिहार के गंगा किनारे गांव में फ़ैल रहा है, गॉल ब्लैडर का कैंसर

 

बिहार में गंगा किनारे के गांवों में पीने के पानी में आर्सेनिक की मात्रा होने के कारण गॉल ब्लैडर का कैंसर पांव पसार रहा है। पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (आइजीआइएमएस) के शोध में यह खुलासा हुआ है। आइजीआइएमएस के क्षेत्रीय कैंसर संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए रिसर्च में पाया गया कि पटना समेत राज्य के जो 15 जिले गंगा किनारे बसे हैं, उनके गांवों में गॉल ब्लैडर (पित्त की थैली) का कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। गंगा बिहार की मुख्य नदी हैं जो प्रदेश के मध्य भाग से गुजरती है। नदी प्रदेश को दो भागों में बांटती है।

 

 

आइजीआइएमएस की रिसर्च टीम का नेतृत्व करने वाले डॉ. अविनाश पांडेय का कहना है कि रिसर्च के तहत 1291 लोगों का परीक्षण किया गया। गंगा के दोनों किनारों पर बसे 15 जिलों के अलावा गया एवं मधुबनी जिले के मरीजों का भी परीक्षण किया गया। लेकिन, सीमावर्ती जिलों से ज्यादा गॉल ब्लैडर के मरीज गंगा किनारे के जिलों में मिले हैं।
डॉ. अविनाश कुमार का कहना है कि 2014, 2015 एवं 2016 में आंकड़ों का संग्रह किया गया। इन आंकड़ों का विस्तृत अध्ययन करने के बाद रिसर्च रिपोर्ट तैयार की गई। पाया गया कि राज्य के सीमावर्ती जिलों की तुलना में गंगा किनारे के जिलों में 1.7 फीसद ज्यादा गॉल ब्लैडर के कैंसर के मरीज मिल रहे हैं।

 

 

राज्य के गंगा किनारे के 15 जिलों पटना, भोजपुर, बक्सर, वैशाली, बेगूसराय, खगडिय़ा, लखीसराय, भागलपुर, मुंगेर, सारण, कटिहार आदि जिलों के भूगर्भ जल में आर्सेनिक की मात्रा औसत से ज्यादा है। यही गॉल ब्लैडर होने का मुख्य कारण है। इस तरह की समस्या न केवल बिहार में बल्कि उत्तर प्रदेश के गंगा किनारे के जिलों में भी पाई जा रही है। बंगाल के गंगा किनारे के जिलों में अभी तक इस तरह का कोई शोध नहीं हुआ है। रिसर्च में शामिल विशेषज्ञों का कहना सामान्यत: पीने वाले पानी में 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर आर्सेनिक की मात्रा होनी चाहिए, लेकिन गंगा किनारे के अधिकांश गांवों के भूगर्भ जल में आर्सेनिक की मात्रा मानक से 1.45 गुना ज्यादा है। पेयजल में आर्सेनिक की अधिकता ही लोगों को गॉल ब्लैडर के कैंसर का मरीज बना रहा है।

 

 

आइजीआइएमएस के चिकित्सकों का कहना है कि सूबे में बढ़ रहे गॉल ब्लैडर के कैंसर को नियंत्रित करने के लिए सरकार को इन इलाके के लोगों के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था करनी होगी।

 

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