सोनभद्र: अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे और धर्म परिवर्तन से जुड़े सोनभद्र के दो मामलों में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ धर्म परिवर्तन या दूसरे धर्म में विवाह कर लेने भर से किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का दर्जा स्वतः समाप्त नहीं होता। हालांकि, मामले के तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों से यह देखा जा सकता है कि व्यक्ति ने अपनी जनजातीय पहचान, रीति-रिवाजों और समुदाय से संबंध बनाए रखे हैं या नहीं।
14 सितंबर को आया फैसला
न्यायमूर्ति अरुण कुमार की अदालत ने 14 सितंबर 2026 को दोनों मामलों में फैसला सुनाया। मामलों में राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अपर महाधिवक्ता Anoop Trivedi ने पक्ष रखा। उनके साथ राज्य की ओर से अन्य अधिवक्ताओं ने भी अदालत में दलीलें पेश कीं।
रजिया उर्फ दुलरिया का मामला
पहले मामले में रजिया उर्फ दुलरिया ने दावा किया था कि वह जन्म से पनिका अनुसूचित जनजाति से हैं। उन्होंने अपने पिता के जनजातीय समुदाय से होने और वर्ष 2012 में जारी ST प्रमाण पत्र का हवाला दिया था। इसके बाद उन्होंने सोनभद्र के दुद्धी क्षेत्र में कृषि भूमि की कई रजिस्टर्ड बिक्री विलेखों के जरिए खरीद की थी। बाद में राजस्व अधिकारियों ने इन जमीनों के हस्तांतरण को लेकर कार्यवाही शुरू की। 22 जनवरी 2026 के आदेशों में संबंधित बिक्री विलेखों को कानून के प्रावधानों के विपरीत बताते हुए शून्य घोषित किया गया और जमीन को राज्य सरकार में निहित करने की कार्रवाई का निर्देश दिया गया। इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
राज्य की ओर से Anoop Trivedi ने क्या दलील दी?
राज्य की ओर से Anoop Trivedi, वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अपर महाधिवक्ता, ने दलील दी कि मामला केवल दूसरे धर्म में विवाह तक सीमित नहीं है। राज्य ने जांच रिपोर्ट, पहचान संबंधी दस्तावेज और परिवार रजिस्टर का हवाला देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता लंबे समय तक अलग धार्मिक और सामाजिक पहचान के साथ रही थीं।
राज्य के अनुसार, रजिया पहले दुलरिया के नाम से जानी जाती थीं और वर्ष 1986 में बहादुर अली से इस्लामी रीति से विवाह के बाद रजिया नाम से रहने लगीं। उनके परिवार रजिस्टर में धर्म मुस्लिम दर्ज होने समेत अन्य परिस्थितियों को भी राज्य ने अदालत के सामने रखा। Anoop Trivedi की ओर से इन परिस्थितियों को केवल विवाह नहीं, बल्कि लंबे समय तक चली सामाजिक और धार्मिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया।
कोर्ट ने धर्म परिवर्तन को लेकर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन को अकेले ST दर्जा खत्म करने का स्वतः आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यह देखना जरूरी है कि व्यक्ति जनजातीय रीति-रिवाजों, परंपराओं, सामाजिक जीवन और समुदाय से अपना संबंध बनाए हुए है या नहीं। अदालत के अनुसार, किसी एक दस्तावेज में मुस्लिम धर्म दर्ज होना भी अकेले निर्णायक नहीं है। मामले में उपलब्ध सभी परिस्थितियों और साक्ष्यों को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए।
लेकिन रजिया अपना जनजातीय जुड़ाव साबित नहीं कर सकीं
अदालत ने पाया कि रजिया की ओर से ऐसा पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि लंबे समय के बावजूद उनका पनिका समुदाय के सामाजिक जीवन, रीति-रिवाजों और सामुदायिक पहचान से निरंतर संबंध बना रहा। इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि संबंधित जमीन खरीदने की तारीखों पर उनका आवश्यक ST दर्जा स्थापित नहीं हो पाया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ST प्रमाण पत्र महत्वपूर्ण साक्ष्य है, लेकिन बाद में सामने आई परिस्थितियों के आधार पर व्यक्ति के वास्तविक और निरंतर जनजातीय दर्जे की जांच की जा सकती है।
जमीन के सौदों पर भी कोर्ट का बड़ा फैसला
अदालत ने कहा कि यदि संबंधित तारीख पर खरीदार आवश्यक ST दर्जा नहीं रखता था, तो केवल यह तथ्य कि जमीन बेचने वाला व्यक्ति ST समुदाय से था, हस्तांतरण को वैध नहीं बना सकता। कानून के विरुद्ध किया गया हस्तांतरण बिक्री विलेख के रजिस्ट्रेशन, राजस्व रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने या लंबे समय तक कब्जे में रहने से वैध नहीं हो जाता।
नन्हकी उर्फ नैमुननिशा का मामला भी इसी मुद्दे से जुड़ा
दूसरे मामले में नन्हकी उर्फ नैमुननिशा ने दावा किया था कि वह जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति से हैं। उन्होंने ST प्रमाण पत्र के आधार पर सोनभद्र के दुद्धी क्षेत्र में जमीन खरीदी थी। बाद में इन बिक्री विलेखों को भी राजस्व अधिकारियों ने कानून के विपरीत मानते हुए शून्य घोषित कर दिया था। इस मामले में भी राज्य की ओर से Anoop Trivedi ने दलीलें रखीं। राज्य का पक्ष था कि नन्हकी लंबे समय से सिराजुद्दीन के साथ मुस्लिम पहचान के तहत रह रही थीं और परिवार रजिस्टर में उनका धर्म मुस्लिम दर्ज था। राज्य ने इसे केवल अंतरधार्मिक विवाह नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही अलग धार्मिक और सामाजिक पहचान के साक्ष्य के तौर पर पेश किया।
हाईकोर्ट ने दोनों मामलों में याचिकाएं खारिज कीं
नन्हकी मामले में कोर्ट ने भी माना कि सिर्फ धर्म परिवर्तन अपने आप ST दर्जा समाप्त नहीं करता, लेकिन संबंधित व्यक्ति को अपनी जनजातीय पहचान और समुदाय से निरंतर जुड़ाव के तथ्य स्थापित करने होते हैं। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि यह निरंतरता पर्याप्त रूप से साबित नहीं हुई। अंततः हाईकोर्ट ने नन्हकी से जुड़ी तीनों याचिकाएं खारिज कर दीं और 22 जनवरी 2026 के राजस्व अधिकारियों के आदेशों को बरकरार रखा। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार इन आदेशों को लागू कर सकता है।
फैसले का सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन फैसलों से यह स्पष्ट होता है कि धर्म परिवर्तन या दूसरे धर्म में विवाह को अकेले ST दर्जा समाप्त करने का स्वतः आधार नहीं माना गया है। लेकिन यदि उपलब्ध साक्ष्यों से यह सामने आता है कि व्यक्ति लंबे समय से अपनी जनजातीय परंपराओं, सामाजिक जीवन और समुदाय से संबंध से अलग हो चुका है और संबंधित तारीख पर जनजातीय सदस्यता साबित नहीं कर पाता, तो उससे जुड़े वैधानिक लाभ और जमीन हस्तांतरण के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।














