सोनभद्र: अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे और धर्म परिवर्तन को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिर्फ धर्म परिवर्तन अपने आप किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का दर्जा खत्म नहीं करता, लेकिन यह भी जरूरी है कि व्यक्ति की जनजातीय पहचान, रीति-रिवाजों, सामाजिक संबंधों और समुदाय से जुड़ाव वास्तव में बना रहे। यह फैसला सोनभद्र की नन्हकी उर्फ नाइमुन्निशा और रजिया उर्फ दुलरिया से जुड़े मामलों में आया है। दोनों महिलाओं ने अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने का दावा करते हुए अपनी जमीन से जुड़े राजस्व अधिकारियों के आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। दोनों मामलों की सुनवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट की कोर्ट नंबर-51 में माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने की।
नन्हकी उर्फ नाइमुन्निशा का मामला क्या है?
नन्हकी उर्फ नाइमुन्निशा ने दावा किया था कि वह जन्म से भुइयां अनुसूचित जनजाति से हैं। उन्होंने अपने पिता महावीर के भुइयां समुदाय से होने और तहसीलदार दुद्धी द्वारा जारी ST प्रमाणपत्र को आधार बनाया था। इसके बाद उन्होंने सोनभद्र के दुद्धी तहसील क्षेत्र के बघारू गांव में कृषि भूमि खरीदी थी।राजस्व अधिकारियों ने 22 जनवरी 2026 के आदेश में इन जमीनों से जुड़े बिक्री विलेखों को कानून के विरुद्ध मानते हुए निरस्त प्रभाव वाला बताया और जमीन को राज्य सरकार में निहित किए जाने की कार्रवाई का निर्देश दिया था। इसके खिलाफ नन्हकी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
नन्हकी के नाम और धर्म को लेकर क्या विवाद था?
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि नन्हकी ने सिराजुद्दीन से इस्लामी रीति से विवाह किया, इसके बाद वह नाइमुन्निशा नाम से रहने लगीं। राज्य ने परिवार रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक उनकी सामाजिक और धार्मिक पहचान मुस्लिम रही तथा उनके बच्चों के नाम भी मुस्लिम थे।हालांकि हाईकोर्ट ने यह नहीं माना कि केवल मुस्लिम नाम या किसी दस्तावेज में मुस्लिम धर्म लिखे होने से ST दर्जा खत्म हो जाता है। कोर्ट ने कहा कि असली सवाल यह है कि संबंधित व्यक्ति ने जनजातीय रीति-रिवाजों, सामाजिक जीवन और समुदाय से अपना जुड़ाव बनाए रखा या नहीं।
रजिया उर्फ दुलरिया का मामला भी इसी तरह का
दूसरे मामले में याचिकाकर्ता रजिया उर्फ दुलरिया ने दावा किया कि वह जन्म से पनिका अनुसूचित जनजाति से हैं। उन्होंने अपने पिता सरदार के पनिका समुदाय से होने और 14 दिसंबर 2012 को जारी ST प्रमाणपत्र का हवाला दिया था। उन्होंने बघारू गांव में कृषि भूमि खरीदी थी। राज्य की ओर से बताया गया कि वह मूल रूप से दुलरिया नाम से जानी जाती थीं और वर्ष 1986 में बहादुर अली से इस्लामी रीति से विवाह के बाद रजिया नाम से रहने लगीं। राज्य ने कहा कि वह लंबे समय तक मुस्लिम सामाजिक और धार्मिक पहचान के साथ रहीं तथा परिवार रजिस्टर में भी उनका धर्म मुस्लिम दर्ज था।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने दोनों मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति का दर्जा सिर्फ धर्म बदलने के कारण अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।लेकिन यदि लंबे समय में व्यक्ति अपने जनजातीय समुदाय की परंपराओं, रीति-रिवाजों, सामाजिक जीवन और समुदाय से स्वीकार्यता का संबंध खो देता है, तो उसके ST दर्जे को लेकर तथ्यात्मक जांच की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के इन फैसलों का लिया गया सहारा
इस मामले में State of Kerala v. Chandramohanan का विशेष महत्व रहा। इस फैसले के आधार पर माना गया कि धर्म परिवर्तन के बावजूद कोई व्यक्ति ST समुदाय का सदस्य रह सकता है, लेकिन इसके लिए उसके जनजातीय गुणों, परंपराओं और समुदाय से जुड़े रहने के तथ्य महत्वपूर्ण हैं।
इसके अलावा Chinthada Anand v. State of Andhra Pradesh के फैसले पर भी भरोसा किया गया। इसमें कहा गया कि यदि समय के साथ कोई व्यक्ति अपनी जनजातीय परंपराओं और रीति-रिवाजों से पूरी तरह अलग हो जाता है और परिवर्तित धर्म की परंपराओं में पूरी तरह assimilate हो जाता है, तो उसे जनजाति का हिस्सा न मानने का निष्कर्ष निकाला जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से Rameshbhai Dabhai Naika v. State of Gujarat के फैसले का भी हवाला दिया गया था। हालांकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह मामला मुख्य रूप से अंतर-समुदाय विवाह से जन्मे बच्चे की ST स्थिति से जुड़ा था और मौजूदा विवाद पर सीधे लागू नहीं होता। वहीं जमीन के ट्रांसफर से जुड़े कानूनी पहलू पर Additional Commissioner, Revenue v. Akhlaq Hussain के फैसले का उल्लेख हुआ। इसमें कहा गया कि कानून द्वारा प्रतिबंधित जमीन का हस्तांतरण केवल रजिस्ट्रेशन, स्टांप ड्यूटी, म्यूटेशन या लंबे समय तक कब्जे के आधार पर वैध नहीं हो सकता।
जमीन के सौदों पर भी कोर्ट की अहम टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि संबंधित जमीन के लेन-देन की वैधता उस समय लागू कानून के आधार पर तय होगी। जिन ट्रांजैक्शन पर विवाद था, वे उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता की संबंधित धाराओं के प्रभावी होने से पहले किए गए थे। इसलिए उनकी वैधता उस समय लागू उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 157-B, 166 और 167 के आधार पर देखी जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि खरीदार संबंधित तारीख पर ST दर्जा साबित नहीं कर पाता, तो सिर्फ यह तथ्य कि जमीन बेचने वाला व्यक्ति ST था, ट्रांसफर को वैध नहीं बना देता।
दोनों महिलाओं को कोर्ट से नहीं मिली राहत
नन्हकी उर्फ नाइमुन्निशा के मामले में हाईकोर्ट ने माना कि वह यह साबित करने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय सामग्री पेश नहीं कर सकीं कि लंबे समय तक अलग धार्मिक और सामाजिक पहचान में रहने के बावजूद उनका भुइयां समुदाय से निरंतर संबंध बना रहा। इसी तरह रजिया उर्फ दुलरिया के मामले में भी कोर्ट ने पाया कि वह पनिका समुदाय से अपनी निरंतर सामाजिक और जनजातीय कड़ी को पर्याप्त साक्ष्यों से स्थापित नहीं कर सकीं।
कोर्ट ने दोनों याचिकाएं खारिज कीं
माननीय न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने दोनों मामलों में संबंधित राजस्व अधिकारियों के 22 जनवरी 2026 के आदेशों को बरकरार रखा। कोर्ट ने याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि अंतरिम आदेश, यदि कोई प्रभावी था, समाप्त माना जाएगा और सक्षम प्राधिकारी कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई कर सकता है। फैसले की तारीख 14 सितंबर 2026 है।
फैसले से निकलती बड़ी बात
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला यह नहीं कहता कि धर्म परिवर्तन होते ही ST दर्जा खत्म हो जाता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामला प्रत्येक व्यक्ति के तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर तय होगा। यदि जनजातीय पहचान, परंपराओं, सामाजिक जीवन और समुदाय से निरंतर जुड़ाव साबित होता है तो केवल धर्म परिवर्तन निर्णायक नहीं होगा। लेकिन यदि लंबे समय तक जनजातीय जीवन और समुदाय से संबंध टूटने के पर्याप्त तथ्य सामने आते हैं, तो ST दर्जे पर सवाल उठ सकता है।






















































