UP: मुजफ्फरनगर में फास्ट ट्रैक कोर्ट थर्ड के जज रवि कुमार दिवाकर ने एक गंभीर मामले में फैसला सुनाने के दौरान अपनी पीड़ा और नाराजगी खुलकर जाहिर की। करीब 8 वर्ष पूर्व पत्नी की हत्या के मामले में सजा सुनाए जाने के बाद जज दिवाकर ने कहा कि वह दबाव या भय में काम करने वाले न्यायाधीश के रूप में पहचाने जाना पसंद नहीं करेंगे।जज रवि कुमार दिवाकर ने कहा कि “मैं मरना पसंद करूंगा, लेकिन डरपोक जज कहलाना पसंद नहीं करूंगा।” उनके इस बयान के बाद अदालत परिसर में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया।
गंभीर मामले कोर्ट से हटाए जाने पर जताई नाराजगी
जज ने अपनी बात रखते हुए कहा कि उनकी कोर्ट से गंभीर मामलों को वापस लिया गया। उन्होंने इस पर दुख जताते हुए कहा कि वह इस पूरे घटनाक्रम से बहुत आहत और दुखी हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी कोर्ट से ऐसे मामलों को हटाया गया, जिनमें गैंगस्टर और माफिया जैसे आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई होनी थी। जज के बयान ने न्यायिक व्यवस्था और गंभीर आपराधिक मामलों की सुनवाई को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
4 महीने में 22 आरोपियों को फांसी की सजा
जज रवि कुमार दिवाकर के कार्यकाल को लेकर यह भी चर्चा है कि उन्होंने महज चार महीने की अवधि में 22 आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई। इन कड़े फैसलों के कारण वह लगातार सुर्खियों में रहे हैं।मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट थर्ड में तैनात जज रवि कुमार दिवाकर अपने सख्त फैसलों और बेबाक टिप्पणियों के लिए पहले भी चर्चा में रहे हैं।पत्नी की हत्या के मामले में फैसला सुनाते वक्त उनके द्वारा कही गई “मैं कायर जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करूंगा” जैसी टिप्पणी ने इस मामले को और भी गंभीर बना दिया है।जज की टिप्पणी के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर उनकी कोर्ट से गंभीर मामले क्यों वापस लिए गए और किन परिस्थितियों में उन्हें ऐसा बयान देना पड़ा? इन सवालों पर आने वाले समय में स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।



















































