लखनऊ: लखनऊ में कलामंथन मंच द्वारा आयोजित साहित्यिक संवाद “स्त्री – कथ्य एवं संवेदना” का आयोजन 28 फरवरी को शिरोज़ हैंगआउट कैफ़ेशिरोज़ हैंगआउट कैफ़े में हुआ। शहर के विविध साहित्यकारों, कवियों और लेखकों की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को विशेष बना दिया।कार्यक्रम का मुख्य फोकस साहित्य में उभरते ज़मीनी स्त्रीवाद, उसकी संवेदनाओं और स्त्रीवाद में बढ़ते बाज़ारवाद के प्रभाव पर केंद्रित रहा।
विचारों का सार
चर्चा में लेखिका रजनी गुप्त, अरुण सिंह, विनीता अस्थाना, डॉ. निशि पांडे और मंथन फाउंडेशन की संस्थापिका सरिता निर्झरा शामिल हुईं।डॉ. निशि पांडे ने बाज़ारवाद को स्त्रीवाद के विरुद्ध बताते हुए कहा कि युवा पीढ़ी को सशक्तिकरण के मायने बाज़ार में नहीं, बल्कि अपने भीतर निर्णय लेने की क्षमता विकसित कर ढूँढने चाहिए।विनीता अस्थाना ने मंचीय स्त्रीवाद से आगे बढ़कर आम महिलाओं की वास्तविक, ज़मीनी कहानियों को साहित्य में स्थान देने की आवश्यकता पर बल दिया।
उपन्यास “तलब” पर चर्चा
कार्यक्रम में मानसिक अवसाद पर लिखे गए उपन्यास “तलब” पर भी विशेष परिचर्चा हुई। दिल्लीदिल्ली से आई इसकी लेखिका सुषमा गुप्ता ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बातचीत करते रहना ज़रूरी है ताकि लोगों की झिझक समाप्त हो सके।कवयित्री पल्लवी विनोद और लेखिका कंचन सिंह चौहान ने भी मानसिक अवसाद से जुड़ी सामाजिक जटिलताओं पर अपने विचार रखे।
संचालन एवं निष्कर्ष
सत्र का संचालन पल्लवी अमित ने किया। मंच की संस्थापिका सरिता निर्झरा ने कहा कि समाज में बदलाव की शुरुआत सार्थक चर्चाओं से होती है, और कलामंथन मंच इसी उद्देश्य से साहित्यिक संवाद को निरंतर दिशा दे रहा है।जौनपुर से आई मंथन फाउंडेशन की लीडर मुन्नी बेगम ने भी अपने विचार रखते हुए समाज में सकारात्मक परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया। कार्यक्रम का समापन पल्लवी राज के सुव्यवस्थित संचालन के साथ हुआ।
INPUT-ANANYA MISHRA
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